चौथी दुनिया पढ़िए, फैसला कीजिए

सोमवार, 22 जून 2009

ग्लैमर की स्याह दुनिया

अनंत विजय

हाल के दिनों में भारतीय अंग्रेजी लेखकों की अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा हुई. चाहे वह काव्या विश्वनाथन पर दूसरे अंग्रेजी लेखकों के उपन्यास अंश उड़ाने पर उठा विवाद हो या किरण देसाई और अरविंद अडिगा का बुकर से सम्मानित होना. विक्रम चंद्रा के सेक्रेड गेम्स को भी विदेशों में ख़ासी लोकप्रियता मिली. पत्रकार सागरिका घोष की किताब ब्लाइंड फेथ को भी न केवल पाठकों ने पसंद किया, बल्कि आलोचकों ने भी कुंभ मेले को केंद्र में रखकर लिखी इस किताब को ख़ूब सराहा. इन सबके बीच युवा फिल्म निर्देशक राजश्री का पहला उपन्यास- ट्रस्ट मी (रूपा एंड कंंंं.)- भी पाठकों को ख़ूब भाया. अगर प्रकाशक की मानें तो राजश्री की इस किताब की चंद महीनों में पच्चीस हज़ार से ज्यादा प्रतियां बिक गईं.राजश्री मूलत: फिल्मकार हैं, जिसने पुणे के फिल्म संस्थान से निर्देशक का कोर्स करने के बाद बॉलीवुड में क़दम रखा. राजश्री द्वारा लिखी और निर्देशित पहली फिल्म द रैबेल को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. फिल्म राजश्री के लिए एक पैशन है. किताब पर लेखिका के परिचय में लिखा है कि वह बचपन से ही फिल्मों की दीवानी थी. शोले फिल्म की टिकट लेने के लिए वह पांच घंटे तक लाइन में खड़ी रही थीं. राजश्री का दो सौ पन्नों का यह उपन्यास एक रोमांटिक कॉमेडी है. यह उपन्यास बॉलीवुड और विज्ञापन की ग्लैमरस दुनिया का विश्वसनीय, समृद्ध और संवेदना का प्रमाणिक सा लगता चित्र उकेरती है. इस उपन्यास की मुख्य पात्र पार्वती है, जो अपनी और अपने मां के सपने के साथ महाराष्ट्र के एक शहर अमरावती से मुंबई पहुंचती है. पार्वती को एक विज्ञापन एजेंसी में नौकरी मिलती है, जहां वह एक कैमरामैन करण पर फिदा हो जाती है. इश्क़ इतना गहरा जाता है कि दोनों के बीच की सारी दीवारें टूट जाती हैं. करण और पार्वती की आशिक़ी पर तब ब्रेक लगता है, जब पता चलता है कि वह गर्भवती है. मारे ख़ुशी के पार्वती के पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे होते हैं और वह हवा में उड़ती हुई अपने आशिक़ करण के पास पहुंचती है. उसकी बांहों में समा कर उसे यह ख़ुशख़बरी देती है. लेकिन करण न तो इस प्यार को लेकर गंभीर था और न ही उसके लिए इस रिश्ते की कोई भावनात्मक अहमियत थी. उसके लिए तो पार्वती एक नारी देह मात्र थी, जिसे वह भोग रहा था. इसलिए जब पार्वती ने उसे अपने गर्भवती होने की ख़ुशख़बरी दी तो उसने बहुत ही ठंढेपन से कहा कि-बच्चा गिरा दो. सन्न रह गई पार्वती ने लाख विरोध किया, डराया-धमकाया, आरजू-मिन्नतें कीं, लेकिन करण ने तो...

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ग़रीबों के रहनुमा थे वीपी

अशोक कुमार सिन्हा

जब सामाजिक जीवन विचार-केंद्रित, सार्थक परिवर्तन- परिचालित न हो, जन आंदोलन रहित हो जाए, ताक़तवर लोगों की सरपरस्ती के तहत ही जीने की मजबूरी हो, लोकतंत्र के विकास के लिए न कोई आकांक्षा हो न तैयारी, व्यापक असमानता, कुव्यवस्था, बेरोज़गारी ही संरचना का चरित्र हो जाए, रजनीति का अकेला अर्थ हो जाए सत्ता के ज़रिए धन का संग्रह- वैसे समय में वीपी सिंह जैसे इतिहास पुरुष की याद आनी स्वाभाविक है, जो कुछ माह पूर्व ही हमसे जुदा हो गए हैं.अंग्रेजों का जमाना था. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तहसील की दो रियासतें थीं- डैया और मांउा. विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म इसी डैया के राजघराने में 25 जून, 1931 को हुआ था. बचपन का लालन-पालन अपनी मां की गोद में यहीं हुआ, लेकिन अपने मूल पिता के परिवार में बालक विश्वनाथ का रहना पांच वर्ष तक ही हुआ. डैया के बगल की रियासत मांडा के राजा थे राजा बहादुर राम गोपाल सिंह. वह नि:संतान थे. अपनी राज परंपरा चलाने के लिए उन्होंने बालक विश्वनाथ के माता-पिता की सहमति से उन्हें गोद ले लिया. फिर तो विश्वनाथ ने पीछे नहीं देखा. गंभीरता से पठन-पाठन में जुट गए. परिणामस्वरूप हाईस्कूल तक कई विषयों में उत्कृष्टता मिली. बाद में वह बनारस के उदय प्रताप सिंह कॉलेज में पढ़ने आए. वहां अच्छे छात्र की पंक्ति में थे विश्वनाथ. प्रिंसिपल ने उन्हें प्रीफेक्ट बनाया. तब तक भारत को आज़ादी मिल चुकी थी. विश्वनाथ की मसें भी भींग रही थीं. विश्वनाथ ने छात्र संघ गठित करने की मांग रखी. अध्यक्ष पद के लिए प्रिंसिपल का एक लाड़ला छात्र खड़ा हुआ. उसे गुमान था कि वह प्रिंसिपल का उम्मीदवार है. प्रतिरोध व्यवस्था में पक्षपात के ख़िला़फ विश्वनाथ के कान खड़े हुए. आजीवन इस्तीफों से मूल्यों को खड़ा करने वाले, ग़लत का प्रतिरोध करने वाले भावी वीपी का यही उदय था. बस क्या था, प्रीफेक्ट पद से इस्तीफा दे दिया. उनकी ज़िंदगी का पहला इस्तीफा हुआ यह. समान विचारों के छात्रों ने संघ के अध्यक्ष पद के लिए उन्हें खड़ा कर दिया. युवा कांग्रेस का आग्रह टालकर वह स्वतंत्र उम्मीदवार बने और प्रिंसिपल के उम्मीदवार को हराकर जीत गए. वोट को आकृष्ट करने की क्षमता का यही बुनियादी अनुभव बना वीपी का. राजनीति इसी अंतराल में इनका विषय बनी. उनके व्यक्तित्व में दो ध्रुव थे. वैज्ञानिक बनने की और सामाजिक कार्यों से मान्यता की मंशा थी. चित्रकारी सामाजिक ध्रुव का हिस्सा थी. इन ध्रुवों के बीच कोई महत्वकांक्षा नहीं थी. इसी के बीच एक ठोस वीपी का उदय हुआ. 24 साल वर्ष की आयु में वह राजनीति की तऱफ संयोगवश मुखातिब हो गए. यहां भी वोट की राजनीति की कल्पना नहीं थी. 1955 में कांग्रेस के चवन्निया सदस्य बने, 24 साल की उम्र में. कांग्रेस में आने का विचार इतर था-सत्ता में हिस्सेदारी नहीं. अपने इलाक़ेके साधारण आदमी की सुनवाई जो नहीं हो रही थी, वही उनकी राजनीति का कालांतर में केंद्र बना.वीपी तन-मन से कांग्रेस की राजनीति में आ गए...
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अहमदीनेज़ाद की जीत से नाख़ुश हुआ अमेरिका

राहुल मिश्र

महमूद अहमदीनेज़ाद चार साल और ईरान के राष्ट्रपति बने रहेंगे. यह ईरान की जनता ने तय कर दिया है, लेकिन यही बात अमेरिका समेत इज़राइल और कुछ अरब देशों को हज़म नहीं हो रही है. अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति बने बराक हुसैन ओबामा ने ईरान के साथ संवाद की संभावनाएं तलाशने के वायदे तो किए, लेकिन ईरान के चुनाव को देखते हुए ओबामा ने उस पर रोक लगा दी. चुनाव के नतीजे आने के बाद अमेरिका ने सबसे पहले चुनावों में धांधली की संभावना व्यक्त कर दी. अमेरिकी बयान से यह पुख्ता हो गया कि उसे ईरान चुनावों में इस नतीजे की उम्मीद नहीं थी.
दरअसल, अमेरिका को आशा थी कि चुनाव के नतीजे संवाद की शर्तों पर असर डाल सकते हैं. लिहाजा, परिणामों का इंतज़ार करने में ही भलाई है. इस आशा के पीछे एक अमेरिकी रणनीति छिपी थी. अमेरिका को भरोसा था कि ईरान की जनता 2005 के राष्ट्रपति चुनावों में की गई ग़लती को नहीं दोहराएगी. वह इस बार सुधारवादी ताक़तों को मज़बूत करेगी और अहमदीनेज़ाद के साथ-साथ कट्टरपंथी शासकों को सबक़ सिखाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ईरान के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 12 जून को 85 फीसदी मतदान हुआ. 62.6 फीसदी वोटों के साथ अहमदीनेज़ाद ने अपने प्रतिद्वंद्वी मीर हुसैन मौसवी(33.75 फीसदी) को हराकर जनता से अगले चार साल तक के लिए अपनी नीतियों को लागू रखने पर फिर मुहर लगवा ली.
इससे तो यही साफ होता है कि अमेरिका को नागवार लगने वाले मुद्दे मध्य एशिया की राजनीति पर छाए रहेंगे. ईरान में अगले चार सालों तक इस्लामिक क्रांति की लौ जलती रहेगी. ईरान में किसी तरह से भी सत्ता में बदलाव की ओबामा की उम्मीद खत्म हो गई. एक बार फिर ओबामा को यह साबित करना होगा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन को जनता के द्वारा नकार दिए जाने के बाद, इस्लामिक देशों के साथ शुरू की गई पहल किस हद तक कारगर साबित होगी. इसके अलावा भी कई अहम सवालों के जबाव इस परिस्थिति में अमेरिका को तलाशने होंगे, मसलन, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने में क्या अमेरिका सफल होगा. इज़राइल की सुरक्षा को सुनिश्चित करने का आश्वासन ज़ारी रहेगा और सबसे अहम क्या अमेरिका मध्य एशिया में शांति प्रक्रिया को दोबारा शुरू करके मध्य एशिया में वर्चस्व की दौड़ पर लगाम लगा पाएगा. इसके साथ ही क्या मध्य एशिया में अमेरिकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
यह सब कैसे हो गया. अमेरिका जो चाहता था वह क्यों नहीं हो पाया. दरअसल, अमेरिकी प्रशासन को मिल रही जानकारियों के मुताबिक, ईरान में अहमदीनेज़ाद के खिलाफ जनता में काफी असंतोष था. पिछले तीस सालों में इस वर्ग ने तरक्की की और तकनीकी क्रांति को क़रीब से देखा. ईरान में ज़ारी इस्लामिक बंदिषों के खिलाफ यह वर्ग शुरू से ही आवाज़ उठाता रहा, यहां तक की 2005 के राष्ट्रपति चुनावों का इस वर्ग ने बहिष्कार भी किया था. कट्टरपंथियों के खिलाफ खडे इस वर्ग को ईरान में वह अधिकार चाहिए जो किसी भी पष्चिमी देशों के नागिकों को मुहैया है. उन्हें ईरान सरकार के तथाकथित नैतिकतावादी रवैए (मोरल पोलिसिंग) से खासी नाराज़गी है और इनके साथ महिलाओं को भी अपनी स्वतंत्रता की दरकार है. यह ईरान का वह तबका है जो अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बेहतर संबंधों की दरकार रखता है.
अहमदीनेज़ाद के खिलाफ चुनाव लड़ रहे मीर होसैन मौसवी के चुनाव प्रचार और रैलियों को पश्चिमी मीडिया अंतर्राष्ट्रीय खबर बना रहा था. दुनियाभर में यह ख़बर आम हो रही थी कि अहमदीनेज़ाद को ईरान की जनता नकार देगी. पिछले तीस सालों से दबी कुचली ईरानी जनता लोकतंत्र के पश्चिमी मानकों को पाने की कोशिश में रूढ़िवादी और कट्टरपंथी इस्लामिक गणराज्य को एक करारा झटका देने वाली है. ईरान के मतदाता 2005 के राष्ट्रपति चुनावों में की गई वही गलती नहीं दोहराएंगे जिसमें इस्लामी गणराज्य के विरोध में युवाओं और सुधारवादी ताकतों ने लामबंदी करके चुनावों का बहिष्कार कर दिया था और नतीज़तन अहमदीनेज़ाद सत्ता पर काबिज़ हो गए थे. वहीं अमेरिकी मीडिया अहमदीनेज़ाद को एक अभद्र नेता के तौर पर पेश करता रहा. अमेरिका के एक चर्चित टैबलॉयड ने तो हमेशा अहमदीनेज़ाद को एक एविल मैडमैन से संबोधित किया, और चुनावों के ठीक पहले तो इस टैबलॉयड ने उन्हें बंदर और बौने तक की संज्ञा दे दी...

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जाति व्यवस्था कैसे जन्मी?

व्यालोक

सनातन धर्म का जो वर्तमान स्वरूप हम देखते हैं, जाति-व्यवस्था को जो निंदनीय स्वरूप हमारे जीवन में ज़हर घोल रहा है, उसकी शुरुआत कैसे हुई, यह एक रहस्य ही है. काफी मगजपच्ची के बावजूद इस बात का कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिलता कि जाति-प्रथा कैसे, किनके द्वारा और क्यों अस्तित्व में आई.ऋग्वेद में केवल तीन वर्णों का उल्लेख है. इसमें ब्रह्मन और क्षत्र शब्द तो आए हैं, लेकिन वैश्य या शूद्र शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है. वैदिक काल में भारतीय प्रजा के लिए हरेक जगह विश शब्द का इस्तेमाल हुआ है, जिसका अर्थ बसने वाला होता है. कालांतर में शायद यही वैश्य शब्द में बदल गया. हां, पुरुष सूक्त में एक बार राजन्य और एक ही बार शूद्र शब्द का इस्तेमाल हुआ है, लेकिन उसे तो विद्वान क्षेपक मानते हैं. सवाल फिर से वही उठता है कि आखिर जाति-प्रथा की शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे एक तर्क तो यह समझ में आता है कि जब भारत में आर्यों का आर्येतर जातियों से संपर्क हुआ तो समाज को एक व्यवस्था देने के लिए जातिगत सोपान बनाए. अचरज की बात यही रही कि बाद में वर्ण-व्यवस्था के अंदर से सैकड़ो जातियां बन गईं. विद्वानों का मत है कि सांस्कृतिक रूप से जो जातियां या लोग पिछड़े थे, उनको ही आर्यों ने शूद्र की संज्ञा दे दी. जाति का विभाजन मनु ने बिल्कुल कठोर कर दिया. वैदिक काल में तो यह व्यवस्था बेहद लचीली थी. यहां तक कि महाभारत में कर्ण का यह संवाद भी है कि वाह्लीक देश (आज का पंजाब) में ब्राह्मण ही शूद्र और नापित बनते हैं औऱ इसका उल्टा भी होता है. ज़ाहिर है कि वैदिक काल में एक वर्ण से दूसरे वर्ण में अतिक्रमण भी खूब होता था. इसका उदाहरण हम पिछले अंक मेंही दे चुके हैं. आर्यों ने जाति-प्रथा का सहारा शायद इसी वजह से लिया कि उनको विविध संस्कृतियों के लोगों को समाज में उनकी सभ्यता के मुताबिक जगह देनी थी. जातिवाद के जरिए समाज में कई दीर्घाएं बनाई गईं, जो अलग संस्कृति और आचार के लोगों को सामाजिक संरचना में जगह मुहैया कराती थीं.यहां द्रविड़ जाति के लोग थे, जो आचार-विचार और संस्कृति के स्तर पर...





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गुरुवार, 11 जून 2009

सोनिया जी, अब अपने मंत्रिमंडल पर नज़र डालिए

वीनू संदल


नई सरकार में शामिल 79 मंत्रियों के मंत्रालयों की घोषणा पिछले दिनों कर दी गई. यह संख्या संवैधानिक सीमा से बस तीन ही कम है. यानी हमारे संविधान के मुताबिक वर्तमान में अधिक से अधिक 82 मंत्री हो सकते हैं. सवाल यह उठता है कि हरेक मंत्री को सौंपा गया मंत्रालय आखिर कितना जायज़ है? दूसरे, क्या राज्यों का असमान प्रतिनिधत्व आगे किसी समस्या को जन्म नहीं देगा? तीसरे, क्या मंत्रालयों और विभागों का यह बंटवारा कई स्तरों पर भ्रम की स्थिति पैदा नहीं करता? ये तीनों ही बिंदु परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हैं. पहला मसला तो पहले ही कई सवालों की वजह से चर्चित हो चुका है. कई की भौंहें तन चुकी हैं. दूसरा सवाल कई को दिलजला बना चुका है. उदाहरण के लिए, कांग्रेस के सबसे अधिक सांसद आंध्र प्रदेश से आए हैं, जहां पार्टी ने राज्य की 42 में से 33 सीटें जीती हैं. इसके बावजूद, यहां से केवल एक सांसद एस जयपाल रेड्‌डी को ही कैबिनेट मंत्री बनाया गया. दूसरा मज़ेदार उदाहरण उत्तर प्रदेश का है. यहां कांग्रेस ने 21 सीटें जीतकर सबको चकित कर दिया. इस राज्य के किसी भी सांसद को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया गया. मेघालय में लोकसभा की केवल दो सीटें, तुरा और शिलांग हैं. तुरा सीट राकांपा के खाते में गई और कांग्रेस ने शिलांग सीट जीती. राकांपा अगाथा संगमा को मंत्री बनाने पर अड़ गई और इसी वजह से कांग्रेस को विंसेंट पाला को भी मंत्री बनाना पड़ा. दूसरे कई राज्यों, जैसे महाराष्ट्र-जिसे आनुपातिक तौर पर ख़ासा बड़ा प्रतिनिधित्व मिला-में भी यही असमानता देखने को मिलती है. इसके लिए आंशिक तौर पर विधानसभा चुनाव की तैयारी का बहाना दिया जा सकता है. साफ-साफ दिखने वाले इस असंतुलन पर सरकार ज़ाहिर तौर पर यह सफाई दे सकती है कि हरेक राज्य से आने वाले मंत्रियों की संख्या पर अधिक मगजपच्ची नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मंत्री तो निस्संदेह राष्ट्रीय हितों को देखने वाले होते हैं. केवल अपने राज्य का ही प्रतिनिधित्व नहीं करते. हालांकि, क्या वास्तविकता ऐसी ही है? उदारहण के लिए, रेलमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कर दिया है कि वह अपने कर्तव्य का बेहतर निर्वहन दिल्ली के मुक़ाबले पश्चिम बंगाल से कर सकती हैं (उन्होंने अपने मंत्रालय की कमान भी दिल्ली के बजाय कोलकाता में संभाली थी).



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अगले सौ दिनों में क्या-क्या करेगी मनमोहन सरकार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अगले सौ दिनों के अपने एजेंडे का ऐलान कर दिया है. इससे वह जताना चाहते हैं कि वादों को पूरा करने में ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी. वह अपनी सरकार को और क्षमतावान, असरदार और तेज़ बनाने की कोशिश में हैं. इसलिए हर तीन महीने के बाद मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा करने का भी ़फैसला लिया गया है. सरकार ने यह साफ कर दिया है कि आंतरिक सुरक्षा को मज़बूत करना, अर्थव्यवस्था में तेज़ी से सुधार लाना और रोज़गार के मौके बढ़ाना ही इस बार की प्राथमिकता होगी. मनमोहन सिंह सरकार ने 100 दिनों के लक्ष्य की घोषणा करके यह साबित किया है कि पिछली बार की तरह वह इस बार एक जवाबदेह सरकार देने की प्रयास कर रहे हैं.
केंद्र सरकार का सबसे पहला फैसला महिला आरक्षण को लेकर है. राष्ट्रपति के अभिभाषण के ज़रिए सरकार ने साफ कर दिया है कि 100 दिनों में संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण की दिशा में क़दम उठाया जाएगा. केंद्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए संगठित प्रयास किए जाएंगे. महिला केंद्रित कार्यक्रमों को मिशन के रूप में लागू करने के लिए सशक्तीकरण पर राष्ट्रीय मिशन शुरू करने की योजना है. हालांकि लोकसभा में सरकार को शरद यादव ने पहला तब झटका दिया, जब उन्होंने यह धमकी दे दी कि अगर महिला आरक्षण बिल मौजूदा रूप में पारित किया गया तो वह ज़हर खा कर जान दे देंगे. सोचने वाली बात है कि उनकी ही पार्टी की सरकार ने बिहार में पंचायत स्तर पर महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने की शुरुआत की है. दरअसल शरद यादव महिला आरक्षण के ख़िला़फ नहीं हैं. उनकी आपत्ति इस बात को लेकर है कि मौजूदा स्वरूप में आरक्षण का फायदा स़िर्फ...
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गलत रणनीति के कारण बिहार में कांग्रेस का बंटाधार

सुरेंद्र किशोर
कांग्रेस ने बिहार में कभी लालू प्रसाद के कथित ‘जंगल राज’ का लगातार साथ देकर ग़लती की और अब वह लालू से दूर हटकर ग़लती कर रही है. अपनी ग़लतियों के कारण लगातार दुबलाती और कुम्हलाती बिहार कांग्रेस यदि अब यह समझ रही है कि वह अकेले अपने बल पर कांग्रेस को बिहार में ताक़तवर बना सकती है, तो वह इस बार भारी ग़लतफहमी में है. अगले कुछ महीनों में राज्य में 17 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं. इसमें कांग्रेस ज़रा अपने बल पर लड़ कर देख ले! उसको एक बार फिर अपनी वास्तविक ताक़त का अनुमान लग जाएगा. कांग्रेस कौन कहे, अभी तो राजद-लोजपा-कांग्रेस मिलकर भी बिहार में कोई चुनावी करिश्मा करने की स्थिति में नहीं हैं. हां, ये मिलकर काम करें तो देर-सवेर एक मज़बूत विपक्ष बन सकते हैं. लोकतंत्र के लिए मज़बूत विपक्ष ज़रूरी है. पर पता नहीं कांग्रेस को यह बात कब समझ में आएगी! जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उसकी सेहत के लिए उतना ही अच्छा होगा. कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार पर विशेष ध्यान देगी. इससे बिहार के कांग्रेस उत्साहित हैं. आने वाले दिनों में शायद राहुल गांधी बिहार में सक्रिय भी हों, पर यहां कांग्रेस के विकास की गुंजाइश का सीमित है. यहां तो कांग्रेस के अधिकांश वोट बैंक पर एनडीए का पहले ही क़ब्ज़ा हो चुका है. जब लालू-राबड़ी शासन के ख़िला़फ आवाज़ उठा कर कांग्रेस को अपना वोट बैंक बढ़ाने का अवसर था, तब तो वह लालू प्रसाद से गलबहियां कर रही थी. अब यदि कांग्रेस को अपनी ताक़त बिहार में भी बढ़ानी है, तो उसे लालू-पासवान के वोट बैंक की आधारशिला पर ही फिलहाल खड़ा होना पड़ेगा. वैसे भी कांग्रेस इस्तेमाल करो और फेंको की नीति में विश्वास करती ही रही है. कांग्रेस जब लालू-राबड़ी के जंगल राज का अंध समर्थन कर रही थी, तब वह ऐसा भाजपा-विरोध के नाम पर कर रही थी. कांग्रेस कह रही थी कि लालू प्रसाद की मदद से ही सांप्रदायिक शक्तियों को मज़बूत होने से रोका जा सकता है. पर कांग्रेस ने इस बात को भुला दिया कि जनता के समक्ष कौन-सी...
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नशे के बारूद पर बैठा पंजाब

संजीव पांडेय


कभी आतंकी बारूद पर बैठा पंजाब अब नशे की बारूद पर बैठा है. यह बारूद कभी भी विस्फोट कर पूरे पंजाब को निगल सकता है. हालात काफी नाज़ुक हैं, सरकार चुप बैठी है. यह खुलासा किसी और का नहीं, बल्कि पंजाब सरकार के ही समाज कल्याण विभाग ने किया है. खुलासे के मुताबिक राज्य के ग्रामीण इलाक़ों के 67 प्रतिशत परिवारों में एक व्यक्ति तो नशे का आदी हो ही चुका है. कभी हरित क्रांति का जनक रहा यह राज्य आज नशा क्रांति के क़ब्ज़े में आ चुका है. हालांकि अलकोहल एवं देसी शराब का सेवन पंजाब की संस्कृति का हिस्सा रहा है, पर पिछले दो दशकों में स्थिति काफी बदल गई है. अब शराब की जगह नए नारकोटिक और सिंथेटिक ड्रग ले रहे हैं, जो एक ख़तरनाक संकेत हैं.राज्य के सामाजिक सुरक्षा एवं महिला व बाल विकास विभाग के सचिव हरजीत सिंह ने नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सबस्टांस एक्ट-1985 के ऊपर बनाए गए एक्शन प्लान पर पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट में दिए गए अपने जवाब में कई गंभीर ख़ुलासे किए हैं. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा था. समाज कल्याण विभाग का यह खुलासा अगर सही है तो पंजाब जैसे राज्य को बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता है. कभी आतंकवाद के दौर में भारी संख्या में युवाओं को खो देने वाले इस राज्य के युवा अब दूसरे ख़तरे की चपेट में आ गए हैं. यह ख़तरा इतना भयानकहै कि आने वाले समय में आतंकवाद से भी ज़्यादा बुरे दौर की आशंका है. समाज कल्याण विभाग के जवाब में ख़ुलासा किया गया है कि राज्य में परंपरागत नशे के अतिरिक्त बड़े पैमाने पर सिथेंटिक ड्रग का इस्तेमाल हो रहा है...
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महिला आरक्षण बिल पर बाज़ी मारने की तैयारी

रूबी अरुण

भारत में महिलाओं की तक़दीर ने करवट ले ली है. अगर हमारे कर्णधारों के बयान पर यक़ीन करें तो विधायिका में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने वाले विधेयक के दिन बहुरने वाले हैं. यह ऐसा बिल है, जो लंबे समय से अटका पड़ा है. कतिपय विरोधों के बावजूद इस पर व्यापक सहमति बन चुकी है. सरकार की कोशिश है कि उच्चतम स्तर की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी हो, जिससे देश में बेहतर शासन सुनिश्चित हो सके. राष्ट्रपति के अभिभाषण के मद्देनज़र अगर महिला आरक्षण लागू हो जाता है तो देश की राजनीति का पूरा चेहरा ही बदल जाएगा. वैसे देखा जाए तो न स़िर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस दृष्टि से महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है. विश्व की आधी आबादी होने के बाद भी समूची संसदीय प्रणाली में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 18.4 फीसदी ही है. जबकि दुनिया में संसदीय प्रणाली वाले देशों की संख्या 187 है. इनमें से केवल 63 में द्विसदनीय व्यवस्था है. इनमें से भी स़िर्फ 32 देशों में ही महिलाओं को वहां की संसद या उसके किसी सदन का अध्यक्ष बनने का अधिकार मिल सका है. इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के मुताबिक 30 अप्रैल 2009 तक के आंकड़ों के अनुसार संसदीय व्यवस्था वाले देशों में सांसदों की कुल संख्या 44 हज़ार 113 थी. इनमें महिला सांसदों की संख्या महज़ 8 हज़ार 112 थी. पुरुष सांसदों की संख्या महिलाओं की तुलना में क़रीब छह गुणा यानी 36 हज़ार 001 थी. वैसे संसदीय व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी के लिहाज़ से वर्ष 2008 खुशगवार रहा. इस वर्ष दुनिया में महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक रही. हालांकि, फिर भी यह आंकड़ा 18 फीसदी के आसपास ही रहा. इस लिहाज़ से देखा जाए तो महिलाओं की दयनीय तस्वीर ही उभर कर सामने आती है. दुनिया की एक चौथाई संसदों में महिला सदस्यों की संख्या 10 प्रतिशत भी नहीं है. सऊदी अरब में तो महिलाओं को वोट डालने का भी हक़ तक नहीं है. अरब देशों में महिलाओं ने औसतन नौ फीसदी संसदीय सीटें जीती हैं लेकिन क़तर, सऊदी अरब और माइक्रोनेशिया (आठ द्वीपीय देशों का समूह) के इतिहास में कभी कोई महिला सांसद नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र के मानकों के मुताबिक विभिन्न संसदों में महिलाओं की भागीदारी 30 फीसदी होनी ही चाहिए. हद तो यह है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े पैरोकार और मानवाधिकारों का ठेकेदार बनने वाले अमेरिका में कांग्रेस के दोनों सदनों-सीनेट और प्रतिनिधि सभा-में सर्वाधिक 17-17 महिला सांसद ही चुनी गईं. महिला सांसदों के मामले में फ्रांस का स्थान आठवां है. यहां 50 प्रतिशत महिला मंत्री हैं....
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रविवार, 7 जून 2009

पीएम से पहले सीएम बनेंगे राहुल

रूबी अरुण

राहुल गांधी देखने में जितने सहज हैं, उनकी राजनीतिक भी उतनी ही सरल हैं. दिल्ली की सत्ता के लिए राजनीतिक दलों ने जब टेढ़े और मुश्किल रास्ते अपना लिए थे, तब वह राहुल ही थे जिन्होंने ग़रीबों-अल्पसंख्यकों के बूते कांग्रेस की सरकार सीधे बनवा दी. अब वह एक नए रास्ते पर चल पड़े हैं, जो केंद्र से राज्य की ओर जाता है. दिल्ली की सत्ता से लखनऊ की सत्ता तक जाता है. इस नई राह पर उठे राहुल के क़दमों में लोग इस सवाल का जवाब पा सकते हैं कि मनमोहन सिंह की नई सरकार में भी वह क्यों शामिल नहीं हुए. वह पार्टी के लिए एक और दुर्ग फतह करने जा रहे हैं. वह उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.केंद्र में यूपीए की सरकार दोबारा बनने के बाद यह सवाल उठाया जा रहा था कि राहुल गांधी ने कैबिनेट मिनिस्टर बनना स्वीकार क्यों नहीं किया? क्यों पार्टी नेताओं की मिन्नतों, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आग्रह और मां सोनिया गांधी की इच्छा का मान राहुल गांधी ने नहीं रखा? क्यों राहुल ने ख़ुद के प्रधानमंत्री बनने की सभी संभावनाओं को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया? इन सवालों का ज़ाहिर तौर पर जो जवाब है वह यह कि राहुल की नज़रों में मंत्री बन कर कैबिनेट में बैठने से ज़्यादा अहमियत संगठन को मज़बूत करना है. पर जो असल कारण है, वह बेहद कूटनीतिक और अपार दूरदर्शी है...



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