चौथी दुनिया पढ़िए, फैसला कीजिए

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

रिपोर्ट पेश न होना राज्यसभा का अपमान

संतोष भारतीय


रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट को सदन में न रखवा पाने वाले राज्यसभा के सदस्य क्या शक्तिहीन और निर्वीर्य हो गए हैं? क्या राज्यसभा जनता के कमज़ोर वर्गों के लोकतांत्रिक अधिकारों का संरक्षण करने में असफल रहने के कारण अपनी सार्थकता खोती जा रही है? राज्यसभा सर्वशक्तिमान है. राज्यसभा में देश के चुने हुए बुद्धिजीवी, लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले नागरिक, संविधानविद्‌, वरिष्ठ व्यक्ति जो लोकसभा या राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं, सदस्य होते हैं. उनके चुनाव में यद्यपि राजनैतिक दलों की भूमिका होती है, पर माना जाता है कि देश की बुनियादी समस्याओं पर उनका रुख़ कमोबेश एक जैसा ही होगा और वे दलों के दलालों की तरह नहीं, देश के लोकतंत्र के प्रहरी और जनता के हितों के पहरुओं की तरह काम करेंगे.यह सर्वशक्तिमान राज्यसभा कमज़ोरों का जमावड़ा बन गई है. देश के ऐसे लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही है, जिनके पास आवाज़ उठाने की ताक़त नहीं है. रंगनाथ मिश्र कमीशन का गठन सच्चर कमीशन से पहले हुआ था. इसके टर्म ऑफ रिफरेंस में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर अन्य धर्मों में दलितों की पहचान जुड़ा था. ईसाई संगठन सुप्रीम कोर्ट गए थे कि उनके दलितों को भी आरक्षण की सुविधा मिले, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला लिया था. रंगनाथ मिश्र कमीशन का गठन कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट के तहत हुआ था......





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बुंदेलखंड बेबस और बदहाल है

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
बुंदेलखंड में लोग ज़िंदगी जीते नहीं, ढोते हैं. प्रकृति और व्यवस्था दोनों ही उनकी कड़ी परीक्षा लेती हैं. ब़ंजर जमीन, पानी की कमी, बेरोजगारी, विकास योजनाओं का अभाव और सरकारी-प्रशासनिक उपेक्षा ने यहां लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. हद तो यह कि उन्हें मिलने वाली मदद भी सियासी दांवपेंच में उलझ कर रह जाती है. बुंदेलखंड के चित्रकूट मंडल की धरती का दर्द बहुत ही गहरा है. हर ओर यहां सिर्फ और सिर्फ सिसकियां ही सुनाई देती हैं. यहां प्रकृति रो रही है, लोग रो रहे हैं, पूरा परिवेश रो रहा है. उत्तर प्रदेश के सात जिलों में फैले बुंदेलखंड में लोग आज भी जल, जंगल और जमीन के लिए तड़प रहे हैं. महिलाओं, दलितों और वंचितों की जिंदगी तो बस बोझ बनकर रह गई है. रोजी-रोटी और पानी की समस्या इतनी विकट है कि हर साल केवल इसी वजह से हजारों लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है. सामंतवाद यहां अभी भी जिंदा है. गरीब, बेबस और लाचार लोगों के साथ यहां कानून भी सिसकियां भरता नजर आता है....

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राज्यसभा में चौथी दुनियाचौथी.....


रूबी अरुण
राज्यसभा में चौथी दुनियाचौथी दुनिया ने रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें अल्पसंख्यकों में दलितों को आरक्षण देने की अनुशंसा की गई है. रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े सांसदों ने इसके लीक होने पर सरकार को आड़े हाथों लिया और इसे सदन के पटल पर रखने की जोरदार मांग की. उस दिन राज्यसभा में हुई गतिविधियों पर केंद्रित है यह रिपोर्ट. सर, मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जितनी कमेटियां बनी हैं, चाहे रंगनाथ कमेटी हो, लिब्रहान हो, चाहे सच्चर हो या श्रीकृष्ण कमेटी हो, ये सभी कमेटी सरकार ने बनाई हैं, लेकिन बनाकर इसको संग्रहालय में रख लिया. इसका अनुपालन नहीं हो पा रहा है. अगर लिब्रहान कमेटी की रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस में छपी होने के बाद सरकार मजबूर हो गई है कि सदन में रखे तो आज चौथी दुनिया में भी रंगनाथ कमीशन की रिपोर्ट निकल गई है. अगर इसे भी सरकार अपने मन से दो चार दिनों में नहीं पेश करती है तो फिर वही दृश्य होगा जो इंडियन एक्सप्रेस में लिब्रहान कमीशन के बारे में छपने के बाद हुआ है. इसके लिए फिर हम लोगों को जिम्मेवार नहीं ठहराया जाए. अगर चौथी दुनिया हिंदी के अखबार में निकला है...
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भारत ईरान के ख़िला़फ क्यों ?


राहुल मिश्र
परमाणु डील पर भारत और अमेरिका के बीच चल रहे रगबी खेल में भारत को एक बार फिर से मुंह की खानी पड़ी. भारत सरकार को इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) में ईरान के ख़िला़फ अपना वोट दर्ज़ कराना पड़ा. अमेरिका की पहली राजकीय यात्रा से लौटते व़क्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बराक ओबामा प्रशासन की ओर से एक सा़फ हिदायत दी गई. यह हिदायत अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेम्स जोंस ने भारत सरकार को सुझाव के तौर पर दी. जोंस ने अपने सुझाव में कहा कि भारत को ईरान के परमाणु कार्यक्रम मामले में अपना रु़ख सा़फ करना चाहिए, क्योंकि ईरान पर भारत का दृष्टिकोण यह तय करेगा कि अप्रैल 2010 में राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी भारत यात्रा के दौरान परमाणु डील पर क्या सौगात परोसने वाले हैं....



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राज्यसभा में चौथी दुनिया


रूबी अरुण
आठ दिसंबर, 2009 की सुबह. राज्यसभा के माहौल में एक अनकही सी कसमसाहट दिख रही है. सभापति उपराष्ट्रपति हामिद अली अंसारी के कक्ष में बैठे कुछ सांसदों में बेचैनी का आलम है. उनके हाथों में साप्ताहिक हिंदी अख़बार चौथी दुनिया की वे प्रतियां हैं, जिसमें अख़बार के प्रमुख संपादक संतोष भारतीय ने राज्यसभा के सांसदों के लिए नाकारा, कमज़ोर और नपुंसक जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है. चूंकि राज्यसभा सांसद अपनी पुरज़ोर कोशिशों के बावज़ूद दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को आरक्षण देने संबंधी अनुशंसाओं वाली रिपोर्ट को राज्यसभा में पेश नहीं करा सके, लिहाज़ा संतोष भारतीय ने सांसदों को इन विशेष शब्दों से विभूषित कर दिया. शब्दों की तासीर ने सांसदों के ज़हन में इतनी तिलमिलाहट भर दी कि जद यू के राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी, राजद के सांसद राजनीति प्रसाद, लोजपा के सांसद साबिर अली और भाकपा के सांसद अजीज़ पाशा ने संतोष भारतीय के ख़िला़फ विशेषाधिकार हनन का नोटिस तक दे दिया. उनकी नाराज़गी अ़खबार से तो थी ही, पर उससे ज़्यादा गुस्सा सरकार पर था कि वह जानबूझ कर सांसदों को ज़लील करा रही है. अगर सरकार चाहती है कि सांसदों पर ऐसी तोहमत न लगे तो उसे तुरंत रंगनाथ मिश्र कमीशन पर संसद में बहस कराना होगा. सभापति के कमरे में इस पर रस्साकशी जारी थी. जदयू सांसद अली अनवर बेहद ख़फा अंदाज़ में सभापति से कह रहे थे कि वह आज इस मसले को उठाना चाहते हैं, सभापति इस बात की इजाज़त दें. तभी वहां मौजूद कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला इस मुबाहिसे में द़खलअंदाज़ी कर
बैठते हैं. वह कहते हैं कि चौथी दुनिया कौन सा ऐसा बड़ा अख़बार है कि जिसमें छपी बातों से आप इतने परेशान हो गए हैं. अरे छोटा-मोटा अख़बार है. हज़ार प्रतियां भी नहीं बिकतीं. दरअसल यहां राजीव शुक्ला की भी अपनी मजबूरियां थीं. सरकार का नुमाइंदा होने की वजह से भला उन्हें यह कैसे मंजूर होता कि उस रिपोर्ट पर सदन में बहस हो, जो सरकार को मुश्किलों में डाल दे. ख़ैर राजीव शुक्ला की बातें सुन रहे भाजपा नेता कलराज मिश्र से रहा नहीं गया. कलराज मिश्र चौथी दुनिया के पुराने पाठक रहे हैं और इसकी ताक़त से भी वाक़िफ हैं. उन्होंने राजीव शुक्ला की बात काटते हुए कहा कि आप ग़लत तथ्य मत रखें. चौथी दुनिया अख़बार और इसके संपादक संतोष भारतीय कोई गुमनाम सी चीज़ नहीं हैं. यह अख़बार बेहद उसूल वाले समाचारपत्रों में शुमार किया जाता रहा है.

इस दरम्यान अली अनवर अंसारी अपनी मांगों को दोहराते रहे. हार कर सभापति उपराष्ट्रपति हामिद अली अंसारी ने अली अनवर से कहा कि कम से कम प्रधानमंत्री कार्यालय मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को तो आने दें, पर अली अनवर और उनके साथियों ने तो जिद ठान ली थी.उन्होंने आख़िरी वार किया कि अगर सभापति अनुमति नहीं देंगे तो वे लोग सदन नहीं चलने देंगे. अब तो सभापति को मानना ही था. उन्होंने अली अनवर से कहा कि ठीक है, प्रश्नकाल में आप अपनी बात सदन में रख सकते हैं. सदन में घड़ी की सूइयों ने जैसे ही 12 बजाए, राज्यसभा सदस्यों ने हंगामा शुरू कर दिया. लोकजन शक्ति पार्टी के सांसद साबिर अली चौथी दुनिया की प्रतियों के साथ वैल में चले आए. वह बेहद उद्वेलित थे. उनका कहना था कि सरकार राज्यसभा सांसदों को बेइज्जत करा रही है. सरकार की लापरवाही के कारण उनकी.....

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पाकिस्तान में आर्थिक सुधार के लिए राजनीतिक सुधार जरूरी

अकदस वहीद

1980 के दशक के अंत से ही पाकिस्तान में उदारीकरण की नीति तेज़ी से लागू की जाने लगी. निर्यात पर लगे टैक्स को कम किया गया और व्यापार पर लगे प्रतिबंधों को बिना देर किए वापस ले लिया गया. पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था के शुरुआती दिनों को एक कमज़ोर औद्योगिक ढांचे के साथ कृषि क्षेत्र के वर्चस्व और एक आधारभूत संरचना की नामौजूदगी के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है. इन सबके परे पाकिस्तान अस्थिर अर्थ-राजनीति का भी शिकार रहा. लिहाजा, शुरुआती दिनों में बनाई गई नीतियों में एक मज़बूत औद्योगिक ढांचा बनाने की कोशिशों पर ज़ोर दिया गया. इस कोशिश में पाकिस्तान ने व्यापार में घरेलू बाज़ार को सुरक्षित रखने के लिए कई प्रतिबंध लगाए. साठ के दशक में पाकिस्तान के औद्योगिक ढांचे की नींव रखी गई, जिसके चलते कई बड़ी-ब़डी उत्पादन इकाइयों को लगाया गया, लेकिन उनमें से कई इकाइयां घरेलू बाज़ार को सुरक्षित रखने के अपने मकसद में ज़्यादा कारगर नहीं हो सकीं. इस विफलता के चलते देश में आयात ब़ढाने के लिए कई क़दम उठाए गए. इनमें एक्सचेंज रेट को पुनर्गठित करना, आयात पर बोनस और उन उद्योगों को क्रेडिट देना शामिल था, जिनमें आयात ब़ढाने की क्षमता थी. पाकिस्तान सरकार के इस क़दम से देश में औद्योगिक उत्पादन के साथ-साथ 1960 के दशक में आयात के आंकड़ों में का़फी इज़ाफा हुआ. इसके बावजूद 1970 के दशक में औद्योगिक विकास को लगाम लग गई, जिसकी अहम वज़ह औद्योगिक क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण करना था. हालांकि सरकार ने कई विभिन्न इकाइयों का राष्ट्रीयकरण किया. इसके अलावा सरकार ने आयात ब़ढाने के लिए उदारीकरण की दिशा में तीन अहम क़दम उठाए, जिनमें 1972 में पाकिस्तानी रुपये की कीमत 57 प्रतिशत कम करना, आयात के लिए दिए जा रहे बोनस की समाप्ति और देश में लाइसेंस राज पर लगाम आदि शामिल हैं. इन फैसलों से पाकिस्तान के आयात में वृद्धि हुई और यह वृद्धि खासतौर पर पाकिस्तान में ही निर्मित उत्पादों में हुई.



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बिहार नीतीश कुमार का या लालू यादव, राम विलास पासवान का

संतोष भारतीय

क्या नीतीश कुमार ने आलोचना सुनना बंद कर दिया है? उनके साथियों का कहना है कि अगर उन्हें मनमा़िफक बात न कही जाए तो वे नाराज़ हो जाते हैं. जिन नीतीश कुमार को हम जानते हैं, वे ऐसे नहीं थे. अभी भी बिहार का एजेंडा तय करने की ताक़त उनमें है. अगर वे यह कर पाए तो बिहार फिर उनका है, और अगर लालू यादव और राम विलास पासवान ने एजेंडा तय किया तो बिहार उनका होगा, नीतीश कुमार का नहीं.नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं. इसी महीने उन्होंने चार साल पूरे किए हैं और चाहते हैं कि अगले वर्ष जब वे विधानसभा चुनाव में जाएं तो उन्हें फिर जीत हासिल हो. नीतीश ने हाल में सत्रह सीटों के लिए हुए उपचुनाव में केवल तीन पर जीत हासिल की, पंद्रह में वे हार गए. दो सीटें भाजपा के पास गईं. कह सकते हैं कि नीतीश कुमार को पांच सीटें मिलीं. हारे तो वे लालू यादव और राम विलास पासवान के गठजोड़ की वजह से, लेकिन एक कारण और था जिसके लिए नीतीश कुमार की तारी़फ की जानी चाहिए. वह कारण था सांसदों और विधायकों के रिश्तेदारों टिकट न देना. कम से कम नीतीश कुमार ने परिवारवाद के खिला़फ कार्यकर्ताओं के लिए अवसर बनाने के लिए जो साहस दिखाया, वह प्रशंसनीय है. यह अलग बात है कि उन्हीं की पार्टी के उन लोगों ने चुनाव में धो़खा दिया, जो अपने बेटे या अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाना चाहते थे. लेकिन केवल एक यही वजह नहीं थी नीतीश कुमार के दल जनता दल (यू) की हार की. कई वजहें और रहीं, पर चार साल पूरे होने पर पहले उन पर नज़र डालें, जो अच्छे कामों की श्रेणी में आते हैं...



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गुरुवार, 27 अगस्त 2009

मार्च में छह दिसंबर दुहराने की साज़िश

आर.के. यादव

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बार फिर अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि निर्माण मुद्दे को गरमाना चाहती है. अपनी खोती जा रही राजनैतिक पकड़ को मज़बूत करने के लिए वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ज़रिए 16 मार्च 2010 से इस दिशा में नई पहल शुरू करने की कोशिश में है. भाजपा की मंशा को देख संघ भी एक बार फिर अपने स्वयंसेवकों के साथ शंखनाद करके पूरे देश की राजनीति में अफरा-तफरी मचाने को तैयारी में है. मंदिर निर्माण के लिए 16 मार्च से 16 मई के बीच हरिद्वार में कुंभ मेले के दौरान निर्माण से जुड़े संगठन व संत कार्यशाला में रखी गई शिलाओं पर लग रही काई को साफ कराने तथा उन शिलाओं को विवादित परिसर के नज़दीक ले जाने की तैयारी करेंगे.हरिद्वार कुंभ मेले में संत यह भी तय करेंगे कि लखनऊ से अयोध्या तक वे पैदल चल कर जाएं और कारसेवकपुरम से राम जन्मभूमि के क़रीब तक शिलाओं को उठाकर ले जाएं. रामजन्म भूमि न्यास से जुड़े पूर्व सांसद डॉ. राम विलास वेदांती ने एक विशेष बातचीत मेंे बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली सरकार के समय एनडीए के घटक दल नहीं चाहते थे कि मंदिर निर्माण हो. यदि भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार होती तो अब तक मंदिर बन चुका होता. 1999 से लेकर 2008 तक भाजपा और आरएसएस द्वारा कोई भी आंदोलन स़िर्फ इसलिए नहीं किया गया कि उसे आशा थी कि जनता उसे हिंदुत्व और राम मंदिर निर्माण के राष्ट्रीय मुद्दे पर शासन-सत्ता पुन: सौंप देगी. लेकिन जनता उनके छलिया आश्वासनों को समझकर उनकी नीतियों को पूरी तहर चकनाचूर कर उन्हें सत्ता के नज़दीक भी नहीं फटकने दिया. ऐसे में सत्तालोलुप भाजपाइयों ने एक बार फिर हिंदुत्व की रक्षा और राम मंदिर निर्माण के लिए कुचक्र रचने में जुट गए हैं. स़िर्फ इस मक़सद से कि पार्टी की डूबती को बचाया जा सके. इसके लिए उसने आरएसएस और संतों को फिर हथियार बना डाला है. इसी उद्देश्य की ख़ातिर अभी हाल में ही आठ अगस्त को अयोध्या स्थित राम सुंदर धाम राजकोट में विहीप सुप्रीमो अशोक सिंघल, मणिराम छावनी महंत ज्ञानदास, धर्मदास, बड़ा भक्तमाला महंत कौशल किशोर दास, दिगंबर अखाड़ा के महंत सुरेश दास, डॉ. राम विलास वेदांती, महंत जगदेव दास, महंत कन्हैया दास आदि ने बैठक की. इसमें हिंदुत्व की बुझी आग को फिर जलाने का ़फैसला किया गया.श्री वेदांती ने बताया कि तीन मंज़िल तक बनने वाले जन्मभूमि मंदिर की दो मंज़िल तक के पत्थर तराशे जा चुके हैं. एक मंज़िल बाक़ी है जो निर्माण के समय ही पूरा कर लिया जाएगा. अभी आंदोलन की पूरी रूपरेखा कुंभ मेले में तय होनी है. संत यह भी तय करेंगे कि जिन शिलाओं का पूजन देश-विदेश में हुआ था, उन शिलाओं को विहिप से जुड़े संत राम जन्मभूमि के अत्यंत नज़दीक तक अपने सिर पर रख कर ले जाएं और वहां रखें. सवाल है कि क्या इस बार के कुंभ मेले में कारसेवकों के बिना ही संत कोई इतना बड़ा निर्णय लेने में कामयाब होंगे? ख़ास कर यह देखते हुए कि इस समय केंद्र में जहां कांग्रेस की अगुआई में मनमोहन सिंह की सरकार है, वहीं उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा की सरकार है. क्या मायावती सरकार इस बार भगवा ब्रिगेड को प्रदेश में घुसने की इजाज़त देगी, जबकि पूर्व में केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होते हुए भी एक लाख संतों ने कभी पैदल मार्च नहीं किया और न ही मंदिर निर्माण की सुधि आई. उस समय तो भाजपा के सांसद लोकसभा में बैठकर सत्तासुख भोगने में ही लगे रहे. और तो और, साधु-संन्यासी भी भाजपा के पूरे पांच साल के शासनकाल में मंदिर मुद्दे को लेकर न तो कोई प्रचार किया और न ही कोई आंदोलन चलाया. उस समय केवल एक ही आंदोलन ख़ूब फला-फुला. वह यह कि पूरे भारत में राम मंदिर निर्माण को लेकर कई समितियां बरसाती मेढ़क की तरह पैदा हो गईं. उन समितियों ने जनता के बीच हिंदुत्व की रक्षा और राम मंदिर निर्माण के नाम पर ख़ूब धन बटोर गईं.इस सवाल के जबाब में श्री वेदांती ने माना कि अयोध्या में राम जन्मभूमि न्यास,....




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सोमवार, 17 अगस्त 2009

हमें मौत दे दीजिए मुख्यमंत्री जी

शमीम अहमद

बुंदेलखंड में पड़े सूखे और भूख के कारण अब किसानों में आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया है. पिछले दो हफ़्तों में भुखमरी के शिकार चार किसानों ने आत्महत्या करके और आने वाले चंद दिनों में डेढ़ दर्जन किसानों ने आत्महत्या करने की घोषणा करके केंद्र और प्रदेश की सरकारों को कठघरे में खड़ा कर दिया है. आत्महत्याओं वाले इलाक़ों से इस समय तीन नेता प्रदेश सरकार में तो एक केंद्र सरकार में मंत्री हैं. विडंबना देखिए कि यहां के किसान फिर भी प्रशासन द्वारा अपेक्षा और उत्पीड़न से परेशान हैं. सूखे को लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने केंद्र के ख़िला़फ हाथ मिला लिया है. इन सबका असर यह हुआ है कि बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाक़ों में अफसरों ने किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता देने से मनाही कर दी है. यानी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच चल रही राजनीतिक लुका-छिपी का असर सीधे किसानों पर पड़ रहा है. हर तऱफ से छल होता देख किसान हताश हो गए हैं. इतने कि आत्महत्या जैसे क़दम उठाने लगे हैं. सूखा, क़र्ज़ और भूख से परेशान होकर 29 जुलाई को ललितपुर जनपद के ग्राम खिंतवास में 75 वर्षीय किसान मुन्नीलाल लोहार ने आत्महत्या कर ली. इसके बाद चार अगस्त को बैरवारा के 28 वर्षीय किसान गोविंद और नौ अगस्त को झांसी के टहरौली तहसील के 75 वर्षीय किसान क्षमाधर यादव ने भी आत्महत्या कर केंद्र और प्रदेश सरकारों के मुंह पर सूखे की हक़ीक़त का तमाचा जड़ दिया. सरकारों तक अपनी आवाज़ और आर्थिक मदद की गुहार कर रहे झांसी जनपद के बबीना ब्लॉक के गुवावली गांव के ही डेढ़ दर्जन किसानों ने प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए जल्द ही परिवार सहित आत्महत्या करने की शपथ ली है. इस सिलसिले में उन्होंने नौ अगस्त को एक हलफनामा तैयार कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को भेज दिया है. इसकी सूचना उन्होंने स्थानीय प्रशासन के अलावा कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी दे दी है. इन किसानों के पास एक हज़ार एकड़ से अधिक कृषि भूमि है, जिन पर इस व़क्त मूंग और मक्के की फसलें खड़ी हैं. बाक़ी फसलों में मूंगफली, सोयाबीन, तिली की फसल है जो पानी न मिलने के कारण बुरी तरह ख़त्म हो चुकी है. सपरिवार आत्महत्या करने की घोषणा करने वालों में ग्राम गुवावली, बबीना के पूर्व प्रधान चंदन सिंह पुत्र पंचम सिंह (49 वर्षीय), ग्राम ख़ास बबीना के 30 वर्षीय रामदास पुत्र बैजनाथ, ग्राम गुवावली के 62 वर्षीय कमल पुत्र स्व. हल्कू ढीमर, ग्राम गुवावली के ही वालिकदास पुत्र राज्जू, लल्लू कोरी पुत्र पच्चू, नंदराम पुत्र धनीराम, रामदास केवट पुत्र कमल, जगदीश पुत्र बंशी-बबीना, 45 वर्षीय रामप्रकाश कुशवाहा पुत्र रज्जू-ग्राम रसीना, हीरा लाल कुशवाहा पुत्र स्व. मोतीलाल मथनपुरा, 56 वर्षीय देशराज पुत्र तिजू, 32 वर्षीय रामकुमार यादव पुत्र पंचम सिंह शामिल हैं. आत्महत्या करने की घोषणा करने वाले इन किसानों की फसल पानी न मिलने के कारण लगभग पूरी तरह चौपट हो रही है. किसानों ने सरकार से मुफ़्त बिजली और खेतों को पानी देने की गुहार लगाई है. खेतों में खड़ी मूंगफली, सोयाबीन, तिल, मूंग, उड़द, मक्के की क़रीब 60 से 70 प्रतिशत फसल सूखती देख किसानों को ख़ून के आंसू रोना पड़ रहा है. मूंगफली की क़रीब 80 प्रतिशत खेती ख़त्म हो चुकी है. फसलों को बचाने के लिए सरकारों की खुली जंग और प्रशासनिक अमले के खड़े हाथ देख किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं. इससे केंद्र और दोनों संबद्ध राज्य सरकारों के ख़िला़फ आक्रोश बढ़ गया है. सूखे की स्थिति को देख किसानों को सूदखोर महाजनों और बैंकों ने किसी भी प्रकार का क़र्ज़ देने से इंकार कर दिया है. किसानों की इस भयावह स्थिति को देख केंद्र और प्रदेश सरकार अभी तक कोई ठोस योजना तैयार नहीं कर पाई है, किसानों के परिवार को भरपेट भोजन तो दूर पीने का पानी तक मुहैया नहीं हो पा रहा है. अपनी स्थिति देख पिछले एक माह में बुंदेलखंड के दस हज़ार से अधिक परिवार अपना घर छोड़कर अन्य क्षेत्रों की और पलायन कर चुके हैं. इन किसानों के पास मौजूद जानवरों में क़रीब एक हज़ार मौत के मुंह में जा चुके हैं, जबकि हज़ारों कसाइयों के शिकार हो गए हैं. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि प्रशासनिक अमला भी इनके गांवों में जाने से कतरा रहा है, जबकि नेता राज्य मुख्यालयों में दुबके बैठे हैं और किसान बराबर मौत को गले लगा रहा है. किसानों का आरोप है कि 2007 में पड़े भयंकर सूखे से भारी क़र्ज़ में फंस गए उनके परिवार अभी तक उस संकट से ही नहीं निकल पाए थे. ऐसे में इस साल के सूखे ने उन्हें भुखमरी के कगार पर ला दिया है. बबीना के इस क्षेत्र में दौ सौ कुंए हैं, जिनमें से तीन से पांच कुओं में पानी सड़ गया है, जो न तो खेती लायक है और न ही पीने के. इस क्षेत्र में 12 गांव हैं. इस क्षेत्र में क़रीब 10 हज़ार एकड़ भूमि उपजाऊ है. इसी क्षेत्र से उत्तर प्रदेश सरकार में अंबेडकर ग्राम विकास मंत्री रतनलाल अहिरवार और केंद्र में...


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रविवार, 2 अगस्त 2009

बंगाल में आंधी

बिमल राय

9 अगस्त 1997 को जब कोलकाता के नेताजी स्टेडियम में कांग्रेस का 80वां पूर्ण अधिवेशन चल रहा था, उसी समय ममता ने मेयो रोड के चौराहे पर गांधीजी की प्रतिमा के सामने अपना तृणमूल का पौधा रोपा. उस समय वह स़िर्फ बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष पद मांग रही थीं, पर तृणमूल के टिकट पर सांसद बने सोमेन मित्र तब ममता के दुश्मन नंबर एक हुआ करते थे.
देह पर नीले बॉर्डर वाली उजली साड़ी और पैर में हवाई चप्पल. पानी और कीचड़ भरी सड़कों पर चलते समय छीटें पड़ते हैं तो पड़ें, मगर उन्हें वहां जल्दी पहुंचना है. इसलिए कि जनता पुकार रही है. बंगाल की तीन दशकों की वाम राजनीति के कुरुक्षेत्र में यह चेहरा हर जगह दिखा है. नाकामियों से निराश नहीं हुई. जनता के दुख-दर्द को अपना समझा, वह भी तहे दिल से. आंसू निकले तो तहे दिल से. आम नेताओं की तरह घड़ियाली नहीं. जी हां, ममता बनर्जी की इसी सादगी, संयम और परिश्रम ने उन्हें एक कामयाब जननेता की कुर्सी पर बैठाया है. अब राज्य की सत्ता के काफ़ी क़रीब दिख रहीं ममता अगले दो सालों में बंगाल की राजनीति की दिशा पलटने वाली हैं. 9 अगस्त 1997 को जब कोलकाता के नेताजी स्टेडियम में कांग्रेस का 80वां पूर्ण अधिवेशन चल रहा था, उसी समय ममता ने मेयो रोड के चौराहे पर गांधीजी की प्रतिमा के सामने अपना तृणमूल का पौधा रोपा. उस समय वह स़िर्फ बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष पद मांग रही थीं, पर तृणमूल के टिकट पर सांसद बने सोमेन मित्र तब ममता के दुश्मन नंबर एक हुआ करते थे. राज्य युवा कांग्रेस के मुखिया के रूप में कार्य करते हुए ही उन्होंने एक तरह से बग़ावत का बिगुल फूंक दिया था. सोमेन से झगड़े की बड़ी वजह माकपा से उनकी क़रीबी ही थी. ममता जहां वाम के ख़िला़फ कड़े तेवर अपनाने के पक्ष में रहती थीं, वहीं ममता के राजनीतिक तेवर बग़ावती या एक तरह से कहें तो अतिवादी रहे. 1984 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से खड़े माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर उन्होंने बंगाल की राजनीति में एक तरह से धमाका कर दिया था. उसके बाद ममता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.बग़ावती तेवर के कारण भी दिखे. आठ अप्रैल 1992 को बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में जब ममता पराजित हुईं, उनका क्षोभ पनपा. यह वैसा ही था कि सीनियर के मुक़ाबले किसी जूनियर को प्रोमोशन दे दिया जाए. उस समय सोमेन की संगठन पर पकड़ मज़बूत थी, मगर जनता में एक जुझारू नेता के रूप में स़िर्फ ममता ही दिखती थीं. बंगाल की गलियों में इस घायल शेरनी की दहाड़ गूंजने लगी. 1993 में ममता ने कांग्रेस के समानांतर ट्रेड यूनियन का गठन कर लिया. इससे उनके पार्टी से अलग होने के संकेत मिलने शुरू हो गए. ममता ने युवा शाखा को अपने तरीक़े से संचालित करना शुरू कर दिया. 1993 में ममता नदिया जिले की एक बलात्कार पीड़िता को लेकर राइटर्स बिल्डिंग चली गईं. वहां मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने मिलने से इंकार कर दिया तो वह बसु के घर के सामने धरने पर बैठ गईं. 23 जुलाई को यहां हुए हंगामे और पुलिस फायरिंग में 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ता मारे गए और इसे लेकर पूरे राज्य में उन्होंने आंदोलन किया. तृणमूल हर साल इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाती है. 1996 के विधानसभा चुनावों में आपराधिक छवि वाले नेताओं को विधानसभा का टिकट देने के मामले पर ममता ने गले में शाल का फंदा लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. 1997 में अग्निकन्या ने कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों का बायकाट किया. इस तरह कांग्रेसी के रूप में 35 साल और विक्षुब्ध के रूप में छह साल गुज़ारने के बाद नौ अगस्त 1997 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस नाम से पार्टी बनाई. एक सक्रिय कांग्रेसी के तौर पर क़रीब 12 साल के कार्यकाल में ममता ने अपने आंदोलनों से बंगाल कांग्रेस में नेतृत्व के ख़ालीपन को भरा, क्योंकि सिद्धार्थ शंकर राय के बाद बंगाल कांग्रेस एक तरह से नेतृत्वहीन हो गई थी. यह भी सच है कि कांग्रेस में रहने के दौरान ममता की ताक़त का एक बड़ा हिस्सा आपसी लड़ाई में ही जाया हुआ. दिल्ली में बैठे कांग्रेस आलाकमान ने कभी ममता का खुले रूप में साथ नहीं दिया. राजीव गांधी का बुलडोजरी अनुशासन वाला युग ख़त्म होने....

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