पिछले दिनों कई मित्रों से इस बारे में बातें हुईं कि नया क्या पढ़ा है. मित्रों ने कई ऐसी किताबों के नाम बताए जिसे या तो प़ढ चुका था या फिर पत्रों में उसकी चर्चा पढ़कर इतना जान चुका था कि उसमें नया कुछ लग नहीं रहा था. इस बीच एक वरिष्ठ आलोचक से बात हो रही थी. नई किताबों पर उनसे चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की एक किताब-हिमालय का महाकुम्भ नंदा राजजात आई है, और वह किताब उल्लेखनीय है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मुझे वह किताब पढ़नी ही चाहिए. बातचीत खत्म हो गई, लेकिन उस किताब को लेकर मेरे मन में कोई उत्साह नहीं बना.....मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
रूपकुंड से आगे की यात्रा
पिछले दिनों कई मित्रों से इस बारे में बातें हुईं कि नया क्या पढ़ा है. मित्रों ने कई ऐसी किताबों के नाम बताए जिसे या तो प़ढ चुका था या फिर पत्रों में उसकी चर्चा पढ़कर इतना जान चुका था कि उसमें नया कुछ लग नहीं रहा था. इस बीच एक वरिष्ठ आलोचक से बात हो रही थी. नई किताबों पर उनसे चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की एक किताब-हिमालय का महाकुम्भ नंदा राजजात आई है, और वह किताब उल्लेखनीय है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मुझे वह किताब पढ़नी ही चाहिए. बातचीत खत्म हो गई, लेकिन उस किताब को लेकर मेरे मन में कोई उत्साह नहीं बना.....यह दवा नहीं ज़हर है.... आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाओं में स्टेरॉयड
कहते हैं कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज़ बढ़ता ही गया. आ़िखर क्यों न बढ़े मर्ज़? जब दवा की शक्ल में आप ज़हर लेंगे तो मर्ज़ बढ़ेगा ही. वह भी उन नामी-गिरामी आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाएं, जिनका नाम ही विश्वास का प्रतीक माना जाता है. ज़रा सोचिए, उस मां का क्या हाल होगा, जिसे यह पता चले कि जो दवा वह अपने बच्चे को उसकी स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए पिला रही है, असल में वही दवा बच्चे को मानसिक रोगी बना रही है अथवा किडनी और लीवर से जुड़ी बीमारियों को जन्म दे रही है. आप उस व़क्त क्या करेंगे, जब यह पता चले कि जिस दवा का इस्तेमाल आपकी बीवी कर रही है, वह दवा उसे ब्लड प्रेशर, हार्ट, किडनी से जुड़े रोग परोस रही है. कुछ ऐसी ही आयुर्वेदिक कंपनियों और उनके द्वारा बनाई जा रही दवाओं की खबर ली है चौथी दुनिया ने, ताकि आपको समय रहते सचेत किया जा सके. हम यहां उन कंपनियों और उनकी मशहूर दवाओं के बारे में बता रहे हैं, जो असल में हमारे और आपके लिए दवा की शक्ल में ज़हर हैं.....बुधवार, 9 दिसंबर 2009
रिपोर्ट पेश न होना राज्यसभा का अपमान
रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट को सदन में न रखवा पाने वाले राज्यसभा के सदस्य क्या शक्तिहीन और निर्वीर्य हो गए हैं? क्या राज्यसभा जनता के कमज़ोर वर्गों के लोकतांत्रिक अधिकारों का संरक्षण करने में असफल रहने के कारण अपनी सार्थकता खोती जा रही है? राज्यसभा सर्वशक्तिमान है. राज्यसभा में देश के चुने हुए बुद्धिजीवी, लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले नागरिक, संविधानविद्, वरिष्ठ व्यक्ति जो लोकसभा या राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं, सदस्य होते हैं. उनके चुनाव में यद्यपि राजनैतिक दलों की भूमिका होती है, पर माना जाता है कि देश की बुनियादी समस्याओं पर उनका रुख़
कमोबेश एक जैसा ही होगा और वे दलों के दलालों की तरह नहीं, देश के लोकतंत्र के प्रहरी और जनता के हितों के पहरुओं की तरह काम करेंगे.यह सर्वशक्तिमान राज्यसभा कमज़ोरों का जमावड़ा बन गई है. देश के ऐसे लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही है, जिनके पास आवाज़ उठाने की ताक़त नहीं है. रंगनाथ मिश्र कमीशन का गठन सच्चर कमीशन से पहले हुआ था. इसके टर्म ऑफ रिफरेंस में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर अन्य धर्मों में दलितों की पहचान जुड़ा था. ईसाई संगठन सुप्रीम कोर्ट गए थे कि उनके दलितों को भी आरक्षण की सुविधा मिले, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला लिया था. रंगनाथ मिश्र कमीशन का गठन कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट के तहत हुआ था......पूरी खबर के लिए चौथी दुनिया पढ़े.....
बुंदेलखंड बेबस और बदहाल है
बुंदेलखंड में लोग ज़िंदगी जीते नहीं, ढोते हैं. प्रकृति और व्यवस्था दोनों ही उनकी कड़ी परीक्षा लेती हैं. ब़ंजर जमीन, पानी की कमी, बेरोजगारी, विकास योजनाओं का अभाव और सरकारी-प्रशासनिक उपेक्षा ने यहां लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. हद तो यह कि उन्हें मिलने वाली मदद भी सियासी दांवपेंच में उलझ कर रह जाती है. बुंदेलखंड के चित्रकूट मंडल की धरती का दर्द बहुत ही गहरा है. हर ओर यहां सिर्फ और सिर्फ सिसकियां ही सुनाई देती हैं. यहां प्रकृति रो रही है, लोग रो रहे हैं, पूरा परिवेश रो रहा है. उत्तर प्रदेश के सात जिलों में फैले बुंदेलखंड में लोग आज भी जल, जंगल और जमीन के लिए तड़प रहे हैं. महिलाओं, दलितों और वंचितों की जिंदगी तो बस बोझ बनकर रह गई है. रोजी-रोटी और पानी की समस्या इतनी विकट है कि हर साल केवल इसी वजह से हजारों लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है. सामंतवाद यहां अभी भी जिंदा है. गरीब, बेबस और लाचार लोगों के साथ यहां कानून भी सिसकियां भरता नजर आता है....
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राज्यसभा में चौथी दुनियाचौथी.....
भारत ईरान के ख़िला़फ क्यों ?
राज्यसभा में चौथी दुनिया
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पाकिस्तान में आर्थिक सुधार के लिए राजनीतिक सुधार जरूरी
1980 के दशक के अंत से ही पाकिस्तान में उदारीकरण की नीति तेज़ी से लागू की जाने लगी. निर्यात पर लगे टैक्स को कम किया गया और व्यापार पर लगे प्रतिबंधों को बिना देर किए वापस ले लिया गया. पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था के शुरुआती दिनों को एक कमज़ोर औद्योगिक ढांचे के साथ कृषि क्षेत्र के वर्चस्व और एक आधारभूत संरचना की नामौजूदगी के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है. इन सबके परे पाकिस्तान अस्थिर अर्थ-राजनीति का भी शिकार रहा. लिहाजा, शुरुआती दिनों में बनाई गई नीतियों में एक मज़बूत औद्योगिक ढांचा बनाने की कोशिशों पर ज़ोर दिया गया. इस कोशिश में पाकिस्तान ने व्यापार में घरेलू बाज़ार को सुरक्षित रखने के लिए कई प्रतिबंध लगाए. साठ के दशक में पाकिस्तान के औद्योगिक ढांचे की नींव रखी गई, जिसके चलते कई बड़ी-ब़डी उत्पादन इकाइयों को लगाया गया, लेकिन उनमें से कई इकाइयां घरेलू बाज़ार को सुरक्षित रखने के अपने मकसद में ज़्यादा कारगर नहीं हो सकीं. इस विफलता के चलते देश में आयात ब़ढाने के लिए कई क़दम उठाए गए. इनमें एक्सचेंज रेट को पुनर्गठित करना, आयात पर बोनस और उन उद्योगों को क्रेडिट देना शामिल था, जिनमें आयात ब़ढाने की क्षमता थी. पाकिस्तान सरकार के इस क़दम से देश में औद्योगिक उत्पादन के साथ-साथ 1960 के दशक में आयात के आंकड़ों में का़फी इज़ाफा हुआ. इसके बावजूद 1970 के दशक में औद्योगिक विकास को लगाम लग गई, जिसकी अहम वज़ह औद्योगिक क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण करना था. हालांकि सरकार ने कई विभिन्न इकाइयों का राष्ट्रीयकरण किया. इसके अलावा सरकार ने आयात ब़ढाने के लिए उदारीकरण की दिशा में तीन अहम क़दम उठाए, जिनमें 1972 में पाकिस्तानी रुपये की कीमत 57 प्रतिशत कम करना, आयात के लिए दिए जा रहे बोनस की समाप्ति और देश में लाइसेंस राज पर लगाम आदि शामिल हैं. इन फैसलों से पाकिस्तान के आयात में वृद्धि हुई और यह वृद्धि खासतौर पर पाकिस्तान में ही निर्मित उत्पादों में हुई.
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बिहार नीतीश कुमार का या लालू यादव, राम विलास पासवान का
क्या नीतीश कुमार ने आलोचना सुनना बंद कर दिया है? उनके साथियों का कहना है कि अगर उन्हें मनमा़िफक बात न कही जाए तो वे नाराज़ हो जाते हैं. जिन नीतीश कुमार को हम जानते हैं, वे ऐसे नहीं थे. अभी भी बिहार का एजेंडा तय करने की ताक़त उनमें है. अगर वे यह कर पाए तो बिहार फिर उनका है, और अगर लालू यादव और राम विलास पासवान ने एजेंडा तय किया तो बिहार उनका होगा, नीतीश कुमार का नहीं.नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं. इसी महीने उन्होंने चार साल पूरे किए हैं और चाहते हैं कि अगले वर्ष जब वे विधानसभा चुनाव में जाएं तो उन्हें फिर जीत हासिल हो. नीतीश ने हाल में सत्रह सीटों के लिए हुए उपचुनाव में केवल तीन पर जीत हासिल की, पंद्रह में वे हार गए. दो सीटें भाजपा के पास गईं. कह सकते हैं कि नीतीश कुमार को पांच सीटें मिलीं. हारे तो वे लालू यादव और राम विलास पासवान के गठजोड़ की वजह से, लेकिन एक कारण और था जिसके लिए नीतीश कुमार की तारी़फ की जानी चाहिए. वह कारण था सांसदों और विधायकों के रिश्तेदारों टिकट न देना. कम से कम नीतीश कुमार ने परिवारवाद के खिला़फ कार्यकर्ताओं के लिए अवसर बनाने के लिए जो साहस दिखाया, वह प्रशंसनीय है. यह अलग बात है कि उन्हीं की पार्टी के उन लोगों ने चुनाव में धो़खा दिया, जो अपने बेटे या अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाना चाहते थे. लेकिन केवल एक यही वजह नहीं थी नीतीश कुमार के दल जनता दल (यू) की हार की. कई वजहें और रहीं, पर चार साल पूरे होने पर पहले उन पर नज़र डालें, जो अच्छे कामों की श्रेणी में आते हैं...पूरी खबर के लिए चौथी दुनिया पढ़े...
गुरुवार, 27 अगस्त 2009
मार्च में छह दिसंबर दुहराने की साज़िश
नेतृत्व वाली सरकार के समय एनडीए के घटक दल नहीं चाहते थे कि मंदिर निर्माण हो. यदि भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार होती तो अब तक मंदिर बन चुका होता. 1999 से लेकर 2008 तक भाजपा और आरएसएस द्वारा कोई भी आंदोलन स़िर्फ इसलिए नहीं किया गया कि उसे आशा थी कि जनता उसे हिंदुत्व और राम मंदिर निर्माण के राष्ट्रीय मुद्दे पर शासन-सत्ता पुन: सौंप देगी. लेकिन जनता उनके छलिया आश्वासनों को समझकर उनकी नीतियों को पूरी तहर चकनाचूर कर उन्हें सत्ता के नज़दीक भी नहीं फटकने दिया. ऐसे में सत्तालोलुप भाजपाइयों ने एक बार फिर हिंदुत्व की रक्षा और राम मंदिर निर्माण के लिए कुचक्र रचने में जुट गए हैं. स़िर्फ इस मक़सद से कि पार्टी की डूबती को बचाया जा सके. इसके लिए उसने आरएसएस और संतों को फिर हथियार बना डाला है. इसी उद्देश्य की ख़ातिर अभी हाल में ही आठ अगस्त को अयोध्या स्थित राम सुंदर धाम राजकोट में विहीप सुप्रीमो अशोक सिंघल, मणिराम छावनी महंत ज्ञानदास, धर्मदास, बड़ा भक्तमाला महंत कौशल किशोर दास, दिगंबर अखाड़ा के महंत सुरेश दास, डॉ. राम विलास वेदांती, महंत जगदेव दास, महंत कन्हैया दास आदि ने बैठक की. इसमें हिंदुत्व की बुझी आग को फिर जलाने का ़फैसला किया गया.श्री वेदांती ने बताया कि तीन मंज़िल तक बनने वाले जन्मभूमि मंदिर की दो मंज़िल तक के पत्थर तराशे जा चुके हैं. एक मंज़िल बाक़ी है जो निर्माण के समय ही पूरा कर लिया जाएगा. अभी आंदोलन की पूरी रूपरेखा कुंभ मेले में तय होनी है. संत यह भी तय करेंगे कि जिन शिलाओं का पूजन देश-विदेश में हुआ था, उन शिलाओं को विहिप से जुड़े संत राम जन्मभूमि के अत्यंत नज़दीक तक अपने सिर पर रख कर ले जाएं और वहां रखें. सवाल है कि क्या इस बार के कुंभ मेले में कारसेवकों के बिना ही संत कोई इतना बड़ा निर्णय लेने में कामयाब होंगे? ख़ास कर यह देखते हुए कि इस समय केंद्र में जहां कांग्रेस की अगुआई में मनमोहन सिंह की सरकार है, वहीं उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा की सरकार है. क्या मायावती सरकार इस बार भगवा ब्रिगेड को प्रदेश में घुसने की इजाज़त देगी, जबकि पूर्व में केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होते हुए भी एक लाख संतों ने कभी पैदल मार्च नहीं किया और न ही मंदिर निर्माण की सुधि आई. उस समय तो भाजपा के सांसद लोकसभा में बैठकर सत्तासुख भोगने में ही लगे रहे. और तो और, साधु-संन्यासी भी भाजपा के पूरे पांच साल के शासनकाल में मंदिर मुद्दे को लेकर न तो कोई प्रचार किया और न ही कोई आंदोलन चलाया. उस समय केवल एक ही आंदोलन ख़ूब फला-फुला. वह यह कि पूरे भारत में राम मंदिर निर्माण को लेकर कई समितियां बरसाती मेढ़क की तरह पैदा हो गईं. उन समितियों ने जनता के बीच हिंदुत्व की रक्षा और राम मंदिर निर्माण के नाम पर ख़ूब धन बटोर गईं.इस सवाल के जबाब में श्री वेदांती ने माना कि अयोध्या में राम जन्मभूमि न्यास,....
