अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जैसे ही अ़फग़ानिस्तान में आतंकवाद के ख़िला़फ अपनी नई नीति की घोषणा की, वैसे ही दुनिया के सबसे ख़तरनाक देश पाकिस्तान में हालात और भी ख़राब हो गए. पाकिस्तानी सेना व विपक्ष के दबाव में आकर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आस़िफ अली ज़रदारी को देश की परमाणु कमान प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी को सौंपनी पड़ी. यह महज़ एक शुरुआत है. ज़रदारी ने यह क़दम भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते संभवत: महाभियोग से बचने के लिए उठाया है. इस क़दम से उन्होंने सेना को संतुष्ट करने की कोशिश की है, जो उन्हें कमज़ोर करने के लिए तैयार बैठी है.पिछले कुछ दिनों से कुछ राजनीतिक दल सेना के साथ मिलकर ज़रदारी को कमज़ोर करने की मुहिम चला रहे हैं. उनकी कोशिश ज़रदारी पर दबाव बनाकर उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर कर देने और उनकी जगह पर किसी कठपुतली को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठा देने की है.पूरी खबर के लिए चौथी दुनिया पढ़े........


किसी भी ज़ख्म की हरेक बरसी- चाहे वह भोपाल गैस त्रासदी, भागलपुर दंगा, ऑपरेशन ब्लूस्टार हो या फिर अहमदाबाद या दिल्ली की गलियों में सिख विरोधी दंगा हो- गुस्से और एमनिसिया (भूलने की बीमारी) के बीच संघर्ष में बदल जाती है. इनके बीच कोई मुक़ाबला ही नहीं है. जीत हमेशा एमनिसिया की होती है. भोपाल में हम अंधे हो गए. सांप्रदायिक दंगों में हम निर्दयी हो जाते हैं. अयोध्या मामले में हमारे पास सबूत नहीं है. शासन में हम नासमझी दिखाते हैं. और संभव है, गुस्से में हम मुद्दाविहीन हो जाते हों. शायद यह निर्धारित तथ्य है कि पीड़ितों को छोड़कर, अपराध या आपराधिक मामलों के समय से ही चुप्पी अख्तियार कर लेने में हर किसी का निहित स्वार्थ होता है. सरकारें संभव है, दंगों को प्रेरित और उकसाती हों, लेकिन ऐसा लोगों की भागीदारी के बग़ैर कभी संभव ही नहीं है. प्रत्येक राजनीतिक दल के इतिहास में यह एक पीड़ादायक सच्चाई है. बहरहाल, आख़िर क्या वजह है कि भोपाल त्रासदी के ग़ुनहगारों, यूनियन कार्बाइड और डाओ केमिकल के लिए सख्त उदासीनता बरती गई? पच्चीस साल पहले भोपाल में यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से 40 टन हवाई ज़हर मिथाइल आइसोसाइनेट के रूप में निकला, जिसकी वजह से उसी व़क्त लगभग 4,000 लोगों की मौत हो गई और तब से लेकर आज तक 15,000 के आसपास लोग मौत की नींद सो चुके हैं. यह अपराध लालच की वजह से हुआ, क्योंकि सुरक्षित विकल्पों की अपेक्षा यह गैस सस्ता पड़ता था. इस वजह से ही इस गैस का इस्तेमाल किया जा रहा था. बहुत कम समय में इस मामले की लीपापोती ने इस मामले को संदिग्ध बना दिया. कार्बाइड ने इस दुर्घटना के लिए असंतुष्ट कर्मचारियों को ज़िम्मेदार ठहराया. हालांकि इन कर्मचारियों के नाम कभी सामने नहीं आए. ऐसा आरोप आसानी से बच निकलने के लिए लगाया गया. 2001 में, डाओ केमिकल ने कार्बाइड को 11.6 बिलियन डॉलर में...
बीती 15 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने एक ऐसे शिक्षक को एक लाख रुपये मुआवजे की सजा से दंडित किया, जिसने आज से 12 वर्ष पहले एक छात्र को पूरे दिन निर्वस्त्र ख़डा रखा था. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रतिभा रानी ने अपने फैसले में उक्त शिक्षक को निर्देश दिया कि वह बतौर मुआवजा एक लाख रुपये पी़िडत छात्र को अदा करे. घटना 25 मई 1997 की है. दिल्ली के एक राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक पी सी गुप्ता ने अपनी कक्षा के एक तेरह वर्षीय छात्र को विद्यालय के तालाब में नहाते हुए पक़ड लिया. गुप्ता उस छात्र के कृत्य से इतने नाराज हुए कि उन्होंने पहले उसे जमकर पीटा, फिर पूरे समय तक विद्यालय में निर्वस्त्र ख़डा रखा. बाद में अभिभावकों ने उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, मुकदमा चला और 19 मार्च 2007 को निचली अदालत ने गुप्ता को एक वर्ष की कैद और ढाई हजार रुपये जुर्माने की सजा सुना दी. गुप्ता इन दिनों अपनी सजा काट रहे थे. उन्होंने निचली अदालत के उसी फैसले को चुनौती दी थी. उनकी अपील के आलोक में न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने अपना ताजा फैसला दिया है. अच्छे व्यवहार की शर्त पर गुप्ता को दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पर रिहा करने से पहले न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने उनकी हरकत की क़डे शब्दों में निंदा भी की. पिछले कुछ दिनों से इस तरह की घटनाएं अक्सर ही सुनने-प़ढने को मिलती रहती हैं, जिनमें मामूली सी गलती पर शिक्षकों द्वारा छात्र-छात्राओं को ब़डी बेरहमी से दंडित किए जाने की बात.
तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा को पूरी उम्मीद है कि चीन में लोकतंत्र के आगमन में अब ज़्यादा देर नहीं है. वह कहते हैं कि गांधीजी के अहिंसा के मार्ग पर चलकर हम पूरे चीन में लोकतंत्र लाना चाहते हैं. पूरा विश्वास है कि पूरे चीन में लोकतंत्र के पक्ष में जो हवा चल रही है, उसे किसी भी हालत में वहां की सत्ता के शिखर पर बैठे लोग रोक नहीं पाएंगे. दलाई लामा ने कहा कि अमेरिका की तिब्बत के प्रति प्रतिबद्धता की बात पर उन्हें किसी तरह की आशंका नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा तिब्बत की स्वायत्तता का संरक्षण करते हैं. दलाई लामा पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित मैलोडगंज के चुगंलाखंग बौद्धमठ में आईएफडब्ल्यूजे के बैनर तले पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे.दलाई लामा के अनुसार, ओबामा ने अपने चुनाव के समय भी उनसे बात कर तिब्बत की स्वायत्तता का समर्थन किया था. उन्होंने ओबामा के चीन जाने से पहले उनसे इसलिए मुलाकात नहीं की, ताकि चीन किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो जाए. उनसे मिलकर जाने पर इस बात की आशंका थी कि चीन अमेरिका के ख़िला़फ कोई भी कड़ा रुख अपना सकता था. उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले साल ओबामा से उनकी मुलाकात ज़रूर होगी. दलाई लामा कहते हैं, हमने चीन के संविधान के अंतर्गत रहकर ही तिब्बत की स्वायत्तता की मांग की है, लेकिन चीन के मन में भय है, इसलिए वह हमें अलगाववादी के रूप में प्रचारित करता रहता है. हमारे प्रयास के ठोस नतीजे अभी तक भले ही न निकले हों, लेकिन आज स्थितियां पूरे चीन में बदल रही हैं. जनता का भी मन बदल रहा है. वहां के हजारों शिक्षकों, पत्रकारों, लेखकों और न्यायपालिका से जुड़े लोगों ने हमसे मिलकर बदलाव की बात कही है. चीन की वर्तमान शासन व्यवस्था का़फी पुरानी हो चुकी है, जनता अब बदलाव का मन बना रही है. लोग चाहते हैं कि मीडिया एवं न्यायपालिका स्वतंत्र रहे और ...

एएफएसपीए, जिसे पूर्वोत्तर राज्य के पहले विद्रोही संगठन नागा काउंसिल को नेस्तनाबूद करने के लिए लाया गया था, आतंकवाद को जड़ से खत्म कर पाने में सक्षम नहीं है. आज असम और मणिपुर में कम से कम 75 आतंकवादी संगठन हैं और इस क्षेत्र के दूसरे राज्यों में भी कई भूमिगत संगठन हैं.