रविवार, 2 अगस्त 2009
बंगाल में आंधी
रविवार, 26 जुलाई 2009
ऐसे फैलता है आतंकवाद
आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, जनसंख्या विस्फोट, सामाजिक बहिष्कार , अतिवाद, नस्लीय अल्पसंख्यकों का दमन, जनजातीय वाद और धार्मिक व राजनीतिक दमन को अगर नहीं सुलझाया गया तो हथियारबंद हिंसा जन्म ले सकती है. चाहे हम इसे उग्रवाद, अतिवाद, आतंकवाद या अलगाववाद कुछ भी कहें. युद्ध की शुरुआत हमेशा आदमी के दिमाग़ में होती है और समान विचारों वाले
लोग पूरी दुनिया में रहते हैं. इसी वजह से इसके परिणाम केवल विवाद वाले देश में ही नहीं महसूस नहीं किए जाते, बल्कि उनकी धमक कहीं और भी सुनाई देती है. आतंकवाद, अपराध और ग़ैर अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र विद्रोह के बीच की रेखाएं इतनी महीन और धुंधली पड़ गई हैं कि अब हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद में फर्क़ ही नहीं कर सकते. कई आतंकी अपने उद्देश्य के लिए लड़ते हुए मरना पसंद करते हैं, ताकि उनकी नज़र में जो सच है उसे पाया जा सके. वह महसूस करते हैं कि वह एक वंचित तबके का हिस्सा हैं और सुखद भविष्य की कोई उम्मीद उनके लिए बाक़ी नहीं है. वह अपनी ज़िंदगी दांव पर इसलिए लगाते हैं ताकि उनके हिसाब से दूसरों को भी शांति और भौतिक रूप से समृद्ध जीवन का अधिकार नहीं है.आस्ट्रिया के राजकुमार की 1914 ई. में सरायेवो में हत्या का मामला पूरी तरह से आस्ट्रिया का आतंरिक मामला था, लेकिन इसकी वजह से पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ. दुनिया में आतंकवादी गतिविधियां भारत के साथ ही चीन, सोवियत संघ, वियतनाम, कंबोडिया और दक्षिण कोरिया-उत्तर कोरिया के अलावा इज़रायल-फिलीस्तीन और पाकिस्तान में भी देखी गई हैं. 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो या पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई के ताज होटल पर हुआ आतंकी हमला, हमारे बच्चों युवाओं और बूढ़ों ने उसे टी.वी. के पर्दे पर लाइव देखा. कई भारतीयों के लिए संसद पर 2001 में हुआ हमला दरअसल हमारे लोकतंत्र पर हमला था. खेलों को पसंद करने वाले लोग 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में वह हमला नहीं भूल सकते, जब तथाकथित फिलीस्तीनी जिहादियों ने 11 इज़रायली एथलीटों की हत्या कर दी थी. हालात यहां तक बिगड़ गए थे कि इज़रायल ने श्रृंखलाबद्ध तरीक़े से बम हमला करके सैंकड़ों गुरिल्लों को मार डाला था. मार्च 2009 में लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर रॉकेट लांचर और ग्रेनेड से हमला किया गया. इस वारदात में आठ लोग मारे गए, जबकि कई घायल हो गए थे. सौभाग्य की बात यही रही कि खिलाड़ियों को मामूली चोटें ही आईं.
हथियारों के मामले में तकनीकी विकास ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं, जहां आतंकी संगठनों को ताज़ातरीन हथियार क़ब्ज़ाने का मौका मिल जाता है और वे अधिक से अधिक बर्बादी और आतंक फैला सकते हैं. दुर्भाग्य से अब तक व्यापक नरसंहार वाले हथियारों के उत्पादन और संग्रहण तथा इस्तेमाल पर रोक नहीं है. हालांकि कुछेक सदस्य देशों ने उन हथियारों पर नियंत्रण के लिए और परमाणु हथियारों के नियमन के लिए संधियां भी की हैं. इस लक्ष्य को पाने के लिए कई तरह के सम्मेलन किए गए हैं. ख़बरें बताती हैं कि पूरी दुनिया में लगभग 36000 परमाणु हथियार हैं. इनमें रूस के पास सबसे अधिक 22,500 हथियार हैं जबकि अमेरिका के पास 12070, फ्रांस के पास 500, चीन के पास 450, ब्रिटेन के पास 380, भारत के पास 65 और पाकिस्तान के पास 25 परमाणु हथियार हैं. इन सबके अलावा दुनिया के 80 देशों ने व्यापक नरसंहार वाले रासायनिक और जैविक हथियार बना लिए हैं. अमेरिका ने 1200 से अधिक परमाणु परीक्षण किए हैं तो रूस ने लगभग 1000, ब्रिटेन ने लगभग 45, फ्रांस ने 210. चीन ने 50 और भारत ने लगभग 10 परमाणु परीक्षण किए हैं. पाकिस्तान ने भारत से होड़ लगाते हुए 10 के आस-पास परमाणु परीक्षण किए हैं, ईरान, इराक़, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया और लीबिया ने भी...
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सोमवार, 20 जुलाई 2009
संसद, सर्वोच्च न्यायालय और सबसे बड़ी
लगता है केंद्र सरकार को धारा 377 हटाने की जल्दबाज़ी है. दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. वैसे तो, नेता और अधिकारी कोर्ट में लंबित मामले पर अपनी ज़ुबान खोलने से बचते हैं, लेकिन धारा 377 के मामले में क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली तो बोले ही, गृह सचिव गोपाल कृष्ण पिल्लई ने भी इंटरव्यू देना शुरू कर दिया है. गृह सचिव का कहना है कि सरकार दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के ख़िला़फ सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएगी. इसकी वजह है कि राजनीतिक गलियारों से यह ख़बर आ रही है कि सरकार दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से भी एक-दोक़दम आगे की सोच रही है. यानी सरकार ने धारा 377 को पूरी तरह से ही ख़त्म करने का मन बना लिया है. हैरानी की बात है कि विरोधी पार्टियों ने भी इस मामले पर चुप्पी साध ली है. यह चुप्पी आगे आने वाले दिनों में काफी ख़तरनाक साबित होने वाली है. धारा 377 के हटते ही भारत में वेश्यावृत्ति (महिला और पुरुष) को मानो लाइसेंस मिल जाएगा. इस धारा को हटाने का ़फैसला महिला विरोधी भी है. इसलिए कि भारत की महिलाओं के हाथ से वह हथियार ही छिन जाएगा, जिसके ज़रिए वे अपने पति की मनमानी के ख़िला़फ क़ानून का सहारा ले सकती हैं. ऐसा लगता है कि भारतीय संसद और न्यायिक व्यवस्था जाने या अनजाने उन ताक़तों के हाथों भ्रमित कर दी गई है, जो ताक़त तीन खरब डालर की सेक्स इंडस्ट्री के पीछे है. दुनिया भर के कमज़ोर और उदार देशों में सेक्स की मंडी खोलने के बाद अब उनकी नज़र भारत पर टिकी है. इन ताक़तों को भारत में एक बड़ा सेक्स-बाज़ार नज़र आ रहा है. उन्हें लगता है कि भारत एक कमज़ोर देश है, जहां कुछ भी संभव है. यही वजह है कि ये ताक़तें भारत को दुनिया का चौथे नंबर का सेक्स-बाज़ार बनाने की ताक में हैं. जिस तरह देश का सुप्रीम कोर्ट किसी व्यक्ति या संस्था को यह नोटिस देता है कि आपके ख़िला़फ अमुक आरोप हैं और क्यों न हम आपको दोषी समझ लें? यदि आप दोषी नहीं हैं तो उसकी सफाई दें. ठीक उसी तरह देश की जनता को भी क्या यह मान लेने का हक़ नहीं कि इस देश को चलाने वाले लोग और इस देश की न्यायिक व्यवस्था जाने-अनजाने इस साज़िश में शामिल है ? हमारे पास जो तथ्य हैं, वे इस संदेह को पुष्ट करते हैं. भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के ़फैसले से देश में एक नई बहस छिड़ गई है. इस मामले से जुड़े तथ्यों को हम पाठकों के सामने सिलसिलेवार तरीक़े से रख रहे हैं, ताकि सभी संबंधित पक्ष अपनी-अपनी सफाई पेश कर सकें. यक़ीन मानिए, अगर हमारे आरोप ग़लत साबित होते हैं, तो हमें बहुत ख़ुशी होगी. अदालत में चले इस मामले के पूरे ब्योरे पर नज़र डालते हैं, ताकि जनता को कम से कम यह तो पता चले कि सच्चाई क्या है...
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सोमवार, 13 जुलाई 2009
संसद, सर्वोच्च न्यायालय और सबसे बड़ी
वर्तमान से कट जाता है तथा संपूर्ण मुक्ति की अवस्था में वह पहुंच जाता है. ऐसी भाषा इस्तेमाल की जाने लगी कि सामाजिक व्यवस्था से विद्रोह करने के नाम पर नशीली दवाएं लेना सही रास्ता नहीं है. कई जगह यह भी बताया जाता था कि नशे की गोली या इंजेक्शन लेने पर लगता कैसा है. गोलियों और इंजेक्शनों को लेना किस मात्रा में ज़्यादा ख़तरनाक है, यह भी ड्रग्स विरोधी आंदोलनकारी बताते थे. सारा अमेरिका और यूरोप इन सेमीनारों, सभा, सम्मेलनों आदि के ज़रिए ड्रग्स के दुष्परिणमों से परिचित हो गया.लेकिन सन पच्चासी में आकर एक नया खुलासा हुआ. चूंकि ड्रग्स माफिया ने एनजीओ खड़े कर दिए, सभाओं, सेमीनारों के लिए फंड करना शुरू कर दिया, इसलिए उसने ड्रग्स का विरोध करने के नाम पर ड्रग्स का प्रचार शुरू करवा दिया और अमेरिका और यूरोप में सफलतापूर्वक अपना धंधा तीन सौ गुना ज़्यादा बढ़ा लिया. सरकार समझ ही नहीं पाई कि उसकी नाक के नीचे इतना बड़ा ग़ैरक़ानूनी धंधा बढ़ गया जिसने वहां की राजनीति तक में अपना प्रभाव बढ़ा लिया. पुलिस, प्रसासन, राजनीति सभी इन माफिया गु्रपों से डरने लगे. आज अमेरिका और यूरोप में सरकार के बाद की बड़ी ताक़त यही माफिया है, जिस पर हाथ डालना वहां की सरकारों के बस में भी नहीं रह गया है.इससे मिलता-जुलता क़िस्सा हमारे देश में भी दोहराया जा रहा है, लेकिन यह ड्रग्स या नशीली दवाओं से जुड़ा नहीं है. हमारे देश में बड़ी मांग सालों पहले उठी कि हमारे यहां वेश्यावृत्ति को क़ानूनी दर्जा दे दिया जाए, वेश्याओं को लाइसेंस दिए जाएं ताकि वे टैक्स दें, अपने स्वास्थ्य की जांच कराएं और चोरी छुपे धंधा कर समाज का स्वास्थ्य न चौपट करें. यह अभियान सफल नहीं हो पाया, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी के संस्कारों के कारण अभियान केवल सभा सेमीनारों तक ही सीमित रह गया, इसे जन समर्थन नहीं मिल पाया.भारत में एक क़ानून है, तीन सौ सतहत्तर. यह क़ानून कहता है कि कोई भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए, चाहे वह पुरुष करे, महिला करे या कोई पशुओं के साथ करे, उसे क़ानूनन आजीवन कारावास तक का दंड दिया जा सकता है. चाहे यह काम खुले रूप में हो या किसी बंद कमरे में, दंड एक ही होगा. दस साल पहले देश में कुछ संस्थाओं ने आवाज़ उठाई कि यह क़ानून होमो सेक्सुअल लोगों की आज़ादी में बाधा डालता है. बंद कमरे में सैकड़ों सालों से बहुत कम लोग यह काम करते रहे हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री. बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो उनमें अपने विकसित होते अंगों को लेकर उत्सुकता होती है और वे आपस में आकर्षित हो जाते हैं. लेकिन सोलह साल आते-आते उनमें समझ आ जाती है. बहुत-सी जगहों पर, जहां वयस्कों को स्त्री के पास जाने का अवसर नहीं मिलता, वहां भी एक बहुत छोटी संख्या अप्राकृतिक यौन संबंध अस्थाई तौर बना लेती है. अभी भी सौ करोड़ के मुल्क में अंगुलियों पर भी गिने जाने लायक लोग नहीं हैं जो कहें कि उन्हें अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का अधिकार दिया जाए.
इसके बावजूद देश में ऐसे एनजीओ बनने लगे जो इन संबंधों की वकालत करने लगे. इनमें से कुछ ने कहा कि अप्राकृतिक यौन संबंधों की वजह से एड्स के फैलने का ख़तरा ज़्यादा है, इसलिए ऐसे लोगों का समूह हाई रिस्क ग्रुप है. और चूंकि तीन सौ सतहत्तर धारा की वजह से ये लोग सामने नहीं आते तो हम उनका इलाज और काउंसिलिंग नहीं कर पाते. इसलिए यह धारा समाप्त होनी चाहिए. जब हम अप्राकृतिक यौन संबंध की बात या होमो सेक्सुअल की बात कहते हैं तो इसे पुरुष और पुरुष के बीच का सेक्स संबंध मानना चाहिए, क्योंकि अभी तक स्त्री और स्त्री के बीच का सेक्स संबंध एड्स के कारणों के फैलाव में नहीं गिना जा रहा. मज़े की बात यह कि सरकार के पास न कोई अध्ययन रिपोर्ट है और न सरकारी आंकड़ा है कि पुरुष से पुरुष के सेक्स संबंध से कितनों में एड्स का फैलाव हुआ और उनमें अब तक कितने मरे. इतना ही नहीं, एड्स की जांच में औरतों की संख्या...
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मंगलवार, 30 जून 2009
लालगढ़ की लाल लपटें
निरीह आदिवासियों पर ज़ुल्म ढाने का लाइसेंस ही समझ लिया. छोटो पेलिया, बोड़ो पेलिया, भासबेर और काटा पहाड़ी इलाकों में पुलिस ने बेरहमी की वो कहानी लिखी, जिसे भुला पाना ग़रीबी और ज़िल्लत की ज़िंदगी जी रहे आदिवासियों के लिए काफी मुश्किल है. इस तरह वे भी ख़ून के बदले ख़ून की जंग के साथ हो गए हैं. हम नहीं सुधरेंगे
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हर मायने में विफल रही. इस बैठक के बाद भाजपा पहले से कहीं ज़्यादा भ्रमित नज़र आ रही है. नेतृत्व और विचारधारा को लेकर, संगठन को मज़बूत करने की बात पर, युवाओं को पार्टी में जगह देने के मसले पर, संघ के साथ संबंध के मुद्दे पर और हिंदुत्व के रूप और मायने पर भाजपा में दिशाहीनता की स्थिति है. हार की वजहों को ढूंढने निकली भाजपा का हाल यह रहा कि इस बैठक के ज़रिए पार्टी की अंदरूनी कलह सबके सामने आ गई. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नेता एक-दूसरे पर निशाना साधते नज़र आए. पार्टी के अंदर मौजूद सारे गुट सबके सामने आ गए. पार्टी के शीर्ष नेताओं ने अपने बयानों से कार्यकर्ताओं को निराश किया और बची-खुची कसर दूसरी पंक्ति के नेताओं ने आपस में लड़कर पूरी कर दी. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हाल किसी पिटे हुए बॉलीवुड फिल्म की तरह रहा. इसकी पृष्ठभूमि शानदार थी, ट्रेलर बनाने में भी ख़ासी मेहनत की गई, ज़ोरदार प्रचार भी किया गया, लेकिन भाजपा की इस फिल्म में कोई क्लाइमेक्स ही नहीं था-बहुत शोर सुनते थे, पहलू में दिल का, जो चीरा तो क़तरा-ए-ख़ूं भी न निकला. दो दिनों की सिरफुटव्वल का कोई नतीजा कुछ भी नहीं निकला. लालकृष्ण आडवाणी ने इस राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी को फिर से उसी दलदल में धकेल दिया जिसकी वजह से पार्टी गर्त में गई है. आडवाणी ने हार के लिए ज़िम्मेदार लोगों का बचाव किया. प्रेस में पार्टी के अनधिकृत रूप से रणनीतिकार बनकर पार्टी के ही ख़िला़फ लिखने वाले अपने चहेते सलाहकारों को बचाया. सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि आडवाणी संगठन को बचाने के लिए देश भर की यात्रा पर निकलेंगे, लेकिन उन्हें कौन बताए कि जब कार्यकर्ता ही पार्टी से रूठ जाएंगे तो आडवाणी की यात्रा भी पिछली यात्रा की तरह बेमानी ही हो जाएगी.अस्तित्व बचाने की कवायद है, माया-भजन समझौता

अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दिन देख रहे भजनलाल ने अंतिम जुआ खेला है. कई तरफ से थपेड़े झेल रहे भजनलाल ने अब मायावती के सहयोग से हरियाणा में कांग्रेस को घेरने की योजना बनाई है. आने वाले विधानसभा चुनाव में भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी मिलकर चुनाव लड़ेगी. हरियाणा विधानसभा चुनाव में अपनी जीत निश्चित मान रही कांग्रेस के लिए निश्चित रुप से यह बुरी खबर है. वोट बैंक के लिहाज से बसपा और भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस का इकठा होना ख़तरनाक है. संभावना जताई जा रही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कड़ी टक्कर मिलेगी. राज्य में एक बार फिर गैर जाट मतदाताओं को इकट्ठा होने का अवसर मिला है. उधर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रहारों को झेल रही मायावती भी कांग्रेस को स्पष्ट संकेत दे रही है कि आने वाले समय में वे यूपी से बाहर गैर कांग्रेसी दलों से समझौता करेंगी. इससे निश्चित तौर पर कांग्रेस की परेशानी बढ़ेगी. मायावती की यह रणनीति यूपी में कांग्रेस को रक्षात्मक रुख लाने पर मजबूर कर सकती है.
18 जून को लखनऊ में मायावती, भजनलाल और उनके बेटे कुलदीप ने संयुक्त रुप से अपनी रणनीति का खुलासा किया. इस रणनीति के तहत हरियाणा विधानसभा चुनाव दोनों मिल कर लड़ेंगे. बड़े दल की भूमिका में भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस रहेगी, जबकि बसपा छोटे भाई की भूमिका में रहेगी. भजनलाल की पार्टी पचास सीटों पर चुनाव लड़ेगी. कुलदीप विश्नोई मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे. बसपा चालीस सीटों पर लड़ेगी. बसपा को सता में आने के बाद डिप्टी सीएम पद मिलेगा. वह दलित वर्ग से होगा. गुप्त तरीके से दिए गए इस समझौते से कांग्रेसी उलझन में फंस गए. आनन-फानन में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा शून्य प्लस शून्य बराबर शून्य. हालांकि यह बयान सच्चाई बयां नहीं करता. समझौते को जिस गुपचुप तरीके से अंजाम दिया गया उससे कांग्रेसी हैरान हैं. कांग्रेस को पता तक नहीं चला. राज्य सचिवालय की गैलरी में सक्रिय पत्रकारों को इसकी जानकारी तक नहीं मिली. सीधे लखनऊ से खबर आई, समझौता हो गया. पत्रकारों के फोन बजने लगे. क्योंकि सब कुछ अप्रत्याशित था. बसपा ने इस बार कांग्रेस को बेवकूफ बनाने के लिए अलग इशारा कर रखा था. बसपा नेता यह संकेत दे रहे थे कि विधानसभा चुनाव में समझौते के लिए उनकी बातचीत इनेलो के ओमप्रकाश चौटाला से चल रही है. इस समझौते के पीछे तर्क यह था कि इनेलो के जाट और बसपा के दलित समीकरण से राज्य विधानसभा में कांग्रेस को घेरा जाएगा. पर सारा खेल ही उल्टा हो गया.
उधर इन सारी परिस्थितियों में हजकां के अंदर हो रहे विद्रोह रुकने के संकेत है. हरियाणा जनहित कांग्रेस के दो नेता सुभाष बतरा और पूर्व मंत्री कृष्णमूर्ति हुड्डा ने हाल ही में विद्रोह कर दिया था और पार्टी अध्यक्ष कुलदीप विश्नोई को ही पार्टी से निकालने का दावा किया था. उन्हें लग रहा था कि भजनलाल अब गए दिन की बात हो गए. उनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है क्योंकि भजनलाल खुद काफी मश्किल से हिसार से लोकसभा जीत कर आए है. उधर लोकसभा चुनाव में 59 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को मिली बढ़त ने हरियाणा जनहित कांग्रेस के नेताओं को निराश कर दिया था.
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मायावती जी, ध्यान दीजिए

आर के यादव और बी.डी शर्मा की रिपोर्ट
भारत की राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति में अयोध्या का महत्व किसी से छुपा नहीं है. यही वह स्थान है, जहां से राम के नाम पर शुरू हुई राजनीति की वजह से हिंदुस्तान की केंद्रीय और प्रादेशिक सत्ता में भूचाल आ गया. धर्म के नाम पर भाजपा की राजनीति राममंदिर के निर्माण को लेकर केंद्रीय सत्ता में चमकी. इसी अयोध्या में भगवान राम के अस्तित्व से ज़ुडा और कई एकड़ क्षेत्र में फैली सप्तसागर नाम की झील आज शासन, प्रशासन और भू-माफियाओं के कारण अपनी पहचान खो चुकी है. इसको बचाने के लिए अयोध्या में कोई महंत या भाजपा का कोई संगठन भी नहीं आया. यदि सप्तसागर का नाम आज के अयोध्या में लिया जाए तो वहां सप्तसागर कॉलोनी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा. सप्तसागर के नाम से जो खाली ज़मीन पड़ी है, उसमें भी अधिकतर को बड़े रसूख वालों के नाम पट्टा कर दिया गया है. लोग मकानों के निर्माण में लगे हैं. इस काम में विकास प्राधिकरण भी पीछे नहीं है. ज़मीन का सौदा बाद में होता है और उसका ऩक्शा पहले बन जाता है. धर्म के ठेकेदारों को इस सप्तसागर के अस्तित्व को ख़त्म करने के लिए मोटी रकम मिल रही है, और इसीलिए आज तक किसी ने इस धरोहर को बचाने की पहल नहीं की.
सप्तसागर का ऐतिहासक महत्व
इतिहासों में वर्णित है कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के राज्याभिषेक के अवसर पर इसमें सातों समुद्रों और समस्त तीर्थो का जल डाला गया, तब से इसका नाम सप्तसागर पडा. ऐसा भी पुराणों में वर्णित है कि सीता नित्य अपनी सहचरियों के साथ कनक भवन से निकल कर सप्तसागर में स्नान कर सप्तसागर के तट पर विराजमान काली जी कीपूजा किया करती थीं. राज परिवार के लोगों का जब विवाह होता था तो उनकी मौरी सप्तसागर में ही विसर्जित की जाती थी. अयोध्यामहात्म्य पुस्तक के अनुसार श्री अयोध्यानगरी के मध्य भाग में रमणीय सप्तसागर नाम का कुंड है जो इच्छित फल देने वाला है. हर पूर्णिमा को समुद्र स्नान करने से जो पूर्ण फल प्राप्त होता है, वही फल इस कुंड में किसी भी दिन स्नान करने से मिलता है. यहां की प्रसिद्घ वार्षिक यात्रा...
कौन है सप्तसागर की जमीन का असली मालिक
आज़ादी के बाद गांवों में ज़मींदारी व्यवस्था तो ख़त्म हो गई थी लेकिन शहरी क्षेत्रों में ज़मींदारी व्यवस्था नहीं ख़त्म हो सकी. अयोध्या में सप्तसागर पर अयोध्या स्थित बड़ा स्थान तथा राजगोपालाचारी मंदिर का आधिपत्य रहा. सप्तसागर की सुरक्षा इन्हीं दो मंदिरों के कर्ताधर्ताओं के विवेक पर निर्भर रही. जब तक धर्मनगरी में धार्मिक आंदोलन चलते रहे, तब तक सप्तसागर झील के रूप में विद्यमान रहा और अयोध्या का पानी उसमें इकट्ठा होता रहा. यह लगता रहा कि सप्तसागर की विरासत ज़िंदा है.आज हालात बदल गए हैं. इस ज़मीन पर दलालों एवं भूमाफियों की नज़र लगभग तीन वर्ष पहले लगी थी. उन्होंने बड़ा स्थान तथा राजगोपालाचारी मंदिरों के महंतों को प्रलोभन देना शुरू किया. साथ ही दलालों ने मोटी कमाई के लालच में ग्राहकों को जुटाना शुरू किया, ये दलाल स्वयं तो पट्टा करते नहीं, केवल ग्राहकों को ढूंढते हैं और पट्टे का काम बड़ा स्थान तथा उससे जुड़े पट्टेदार स्वयं करते है, इन महंतों का कार्य भी इस तरह से चलता है कि किसी को यह शक न हो कि पट्टा कब और कैसे हो गया. इसकी भनक किसी को न लगे, इसके लिए इन दोनों मंदिरों में ज़मीनों के रख-रखाव व खरीद-फरोख़्तके लिए अलग विभाग हैं. ज़मीन की बिक्री कितने में होती है, सौदा कौन करता है, इससे इन महंतों को मतलब...
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नदियों को भी बेचने को तैयार सरकार
कुछ वर्ष पहले ताजा पेयजल के मुद्दे पर एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें क़रीबन 130 देशों ने शिरकत की थी. इसमें निष्कर्ष यह निकला था कि बहुत जल्द वह वक्त भी आएगा, जब पानी का वितरण पाइपलाइन और टैंकरों के जरिए किया जाएगाऔर 21 वीं सदी में पानी ही युद्धों का सबब बनेगा. फिलहाल करीबन एक अरब 30 करोड़ लोगों को पेयजल मुहैया नहीं है और लगभग दो अरब 40 करोड़ लोगों को सफाई का पानी उपलब्ध नहीं है. यह मौन ख़तरा लगभग 6000 लोगों की रोज़ना जान लेता है. भविष्य के आसार तो यह भी दिखते हैं कि 2015 तक जनसंख्या की बढ़ोतरी और प्रवास लगभग एक अरब साठ लाख लोगों को पानी के लिए संघर्ष पर मज़बूर करेगा. दो अरब लोगों को सफाई के लिए पानी की ज़रूरत महसूस होगी. पानी के लिए मानवता की मांग दंग करने वाली हद तक यानी 30 फीसदी तक बढ़ेगी. भारत में दूसरे देशों की तुलना में हालात और भी खराब हैं, हम यहां केवल कुछ ज्वलंत उदाहरण देंगे, जिससे पानी की कमी होने के सबूत बिल्कुल स्पष्ट हो जाते हैं. उदाहरण के लिए-1. दिल्ली-हरियाणा सीमा पर रोहतक रोड पर पानी की सख्त कमी की वजह से दंगे हुए. इसमें तीन पुलिस अधिकारियों के साथ ही लगभग 15 लोग घायल हुए और कई आते-जाते वाहनों को नुकसान पहुंचा.
2. पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी में पानी को लेकर हुए दंगे ने सांप्रदायिक रूप ले लिया. इसमें दो लोग घायल हुए.
3. राजकोट में लोगों ने एक मृतक के शरीर को वैसे ही छोड़ दिया, जैसे ही उन्होंने पानी के टैंकर को देखा. कारण स्पष्ट था. अंतिम संस्कार तो बाद में भी किया जा सकता है, लेकिन पानी के टैंकर को नहीं छोड़ा जा सकता है.
4. उत्तर भारत में कोई भी विवाह समारोह किसी वधू के कुंआ पूजन...
भारत में नदियों को बेचने की साज़िश
विश्व बैंक और आईएमएफ के इशारे पर भारत में भी पानी को बड़ी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय निगमों को बेचा जा रहा है. यहां तक कि नदियों को भी नहीं बख्शा गया. गुणवत्ता और सबको उपलब्धता के नाम जो ख़तरनाक खेल हो रहा है, वह पूरी तरह से ग़ैर-बराबरी और जनता के साथ अन्याय करनेवाला है. यह किसी एक राज्य में या शहर में नहीं हो रहा है. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भारतीय जनता को आसानी से मिलनेवाला पानी विदेशी कंपनियों को बेचा जा रहा है, जो बदले में उससे सैकड़ो गुणा मुनाफा कमाएंगी. ख़ुद हम उस पानी को ऊलजलूल दाम पर ख़रीदेंगे औऱ बदले में हमें पानी भी नसीब नहीं होगा. या होगा, तो प्रदूषित और ज़हरीला. वैसे तो, हम आपको राज्यवार ब्योरे भी समयानुसार मुहैया कराएंगे, लेकिन पहले देख लें कि किस तरह नदियों की धारा को भी महज कुछ लोगों की स्वार्थ को पूरा करने का...
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पश्चिम बंगालः अगली बार ज्वालामुखी
वाममोर्चे ने बंगाल में भले ज़मीन खो दी हो, पर क्या किसी ने इस पर ध्यान दिया था? कांग्रेस ने 1962 और 1967 में हक़ीक़त को महसूस नहीं किया और क्या कुछ देर पहले तक किसी ने इसकी दूसरी व्याख्या की थी़ वर्ष 1962 में वामपंथी राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से ग़लत थे. वजह यह कि उसी साल अक्तूबर में हुए त्रासद युद्ध में चीन के आक्रामक रवैए की उन्होंने निंदा नहीं की थी. ज्योति बसु ने अपने कॉमरेडों के साथ कुछ महीने जेल में भी काटे थे. पार्टी ने आंतरिक तौर पर अपनी ग़लती को सुधारा. चीन समर्थक अतिवादी अपने ढंग से क्रांति करने के लिए पार्टी से अलग हो गए. नक्सलियों (यह नाम उत्तरी बंगाल के छोटे से गांव नक्सलबारी के कारण हुआ) ने माओत्से तुंग को अपना भी चेयरमैन घोषित कर दिया. यह अलग बात है कि माओ इस बात से ख़ुश थे या नहीं, कह नहीं सकते. वामपंथी आधिकारिक तौर पर टूट चुके थे. टूटा हुआ धड़ा सीपीआई(एम) अधिक संतुलित था. यह कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट की स्वतंत्रता बाद की यह पीढ़ी के मनमाफिक रेडिकल था और उनके नौकरीपेशा अभिभावकों के लिए उनकी नौकरी ख़त्म करने पर तुले नक्सलियों की तुलना में अहिंसक भी. वैसे भी, भारत में समस्या सुलझाने का अनूठा तरीक़ा यही है कि समस्या की ओर से पीठ मोड़कर खड़े हो जाएं. कांग्रेस भी ऐसी उठापटक से अछूती नहीं थी. प्रणव मुखर्जी को वह समय याद होगा...