रूबी अरुण
वे दिन गए जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि कमज़ोर और दब्बू नेता की हुआ करती थी। मनमोहिनी मुस्कान और भींचे होठ ही उनकी पहचान थी। आज मनमोहन का अंदाज़-ए-बयां कुछ बदला हुआ सा है। वह अब खुलकर नीतिगत ़फैसले लेने लगे हैं। मनमोहन न स़िर्फअपनी बल्कि अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों की ज़िम्मेदारियां भी तय करने लगे हैं। अब प्रधानमंत्री पहले की तरह लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते. उन्हें अपने मन की भाषा बोलनी आ गई है. यही वजह है कि अपनी दूसरी पारी में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में भाग लेते समय मनमोहन ने कोई लिखित भाषण नहीं पढा. वही कहा, जो उन्हें वाजिब लगा. विनम्र, मृदुभाषी प्रधानमंत्री के तेवर इन दिनों ज़रा सख़्त दिखने लगे हैं. उनके क़रीबी मित्र और सहयोगी उनके इस अंदाज़ से ख़ासे चकित हैं. अमूमन
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें