राहुल मिश्र
महमूद अहमदीनेज़ाद चार साल और ईरान के राष्ट्रपति बने रहेंगे. यह ईरान की जनता ने तय कर दिया है, लेकिन यही बात अमेरिका समेत इज़राइल और कुछ अरब देशों को हज़म नहीं हो रही है. अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति बने बराक हुसैन ओबामा ने ईरान के साथ संवाद की संभावनाएं तलाशने के वायदे तो किए, लेकिन ईरान के चुनाव को देखते हुए ओबामा ने उस पर रोक लगा दी. चुनाव के नतीजे आने के बाद अमेरिका ने सबसे पहले चुनावों में धांधली की संभावना व्यक्त कर दी. अमेरिकी बयान से यह पुख्ता हो गया कि उसे ईरान चुनावों में इस नतीजे की उम्मीद नहीं थी.
दरअसल, अमेरिका को आशा थी कि चुनाव के नतीजे संवाद की शर्तों पर असर डाल सकते हैं. लिहाजा, परिणामों का इंतज़ार करने में ही भलाई है. इस आशा के पीछे एक अमेरिकी रणनीति छिपी थी. अमेरिका को भरोसा था कि ईरान की जनता 2005 के राष्ट्रपति चुनावों में की

गई ग़लती को नहीं दोहराएगी. वह इस बार सुधारवादी ताक़तों को मज़बूत करेगी और अहमदीनेज़ाद के साथ-साथ कट्टरपंथी शासकों को सबक़ सिखाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ईरान के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 12 जून को 85 फीसदी मतदान हुआ. 62.6 फीसदी वोटों के साथ अहमदीनेज़ाद ने अपने प्रतिद्वंद्वी मीर हुसैन मौसवी(33.75 फीसदी) को हराकर जनता से अगले चार साल तक के लिए अपनी नीतियों को लागू रखने पर फिर मुहर लगवा ली.
इससे तो यही साफ होता है कि अमेरिका को नागवार लगने वाले मुद्दे मध्य एशिया की राजनीति पर छाए रहेंगे. ईरान में अगले चार सालों तक इस्लामिक क्रांति की लौ जलती रहेगी. ईरान में किसी तरह से भी सत्ता में बदलाव की ओबामा की उम्मीद खत्म हो गई. एक बार फिर ओबामा को यह साबित करना होगा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन को जनता के द्वारा नकार दिए जाने के बाद, इस्लामिक देशों के साथ शुरू की गई पहल किस हद तक कारगर साबित होगी. इसके अलावा भी कई अहम सवालों के जबाव इस परिस्थिति में अमेरिका को तलाशने होंगे, मसलन, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने में क्या अमेरिका सफल होगा. इज़राइल की सुरक्षा को सुनिश्चित करने का आश्वासन ज़ारी रहेगा और सबसे अहम क्या अमेरिका मध्य एशिया में शांति प्रक्रिया को दोबारा शुरू करके मध्य एशिया में वर्चस्व की दौड़ पर लगाम लगा पाएगा. इसके साथ ही क्या मध्य एशिया में अमेरिकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
यह सब कैसे हो गया. अमेरिका जो चाहता था वह क्यों नहीं हो पाया. दरअसल, अमेरिकी प्रशासन को मिल रही जानकारियों के मुताबिक, ईरान में अहमदीनेज़ाद के खिलाफ जनता में काफी असंतोष था. पिछले तीस सालों में इस वर्ग ने तरक्की की और तकनीकी क्रांति को क़रीब से देखा. ईरान में ज़ारी इस्लामिक बंदिषों के खिलाफ यह वर्ग शुरू से ही आवाज़ उठाता रहा, यहां तक की 2005 के राष्ट्रपति चुनावों का इस वर्ग ने बहिष्कार भी किया था. कट्टरपंथियों के खिलाफ खडे इस वर्ग को ईरान में वह अधिकार चाहिए जो किसी भी पष्चिमी देशों के नागिकों को मुहैया है. उन्हें ईरान सरकार के तथाकथित नैतिकतावादी रवैए (मोरल पोलिसिंग) से खासी नाराज़गी है और इनके साथ महिलाओं को भी अपनी स्वतंत्रता की दरकार है. यह ईरान का वह तबका है जो अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बेहतर संबंधों की दरकार रखता है.
अहमदीनेज़ाद के खिलाफ चुनाव लड़ रहे मीर होसैन मौसवी के चुनाव प्रचार और रैलियों को पश्चिमी मीडिया अंतर्राष्ट्रीय खबर बना रहा था. दुनियाभर में यह ख़बर आम हो रही थी कि अहमदीनेज़ाद को ईरान की जनता नकार देगी. पिछले तीस सालों से दबी कुचली ईरानी जनता लोकतंत्र के पश्चिमी मानकों को पाने की कोशिश में रूढ़िवादी और कट्टरपंथी इस्लामिक गणराज्य को एक करारा झटका देने वाली है. ईरान के मतदाता 2005 के राष्ट्रपति चुनावों में की गई वही गलती नहीं दोहराएंगे जिसमें इस्लामी गणराज्य के विरोध में युवाओं और सुधारवादी ताकतों ने लामबंदी करके चुनावों का बहिष्कार कर दिया था और नतीज़तन अहमदीनेज़ाद सत्ता पर काबिज़ हो गए थे. वहीं अमेरिकी मीडिया अहमदीनेज़ाद को एक अभद्र नेता के तौर पर पेश करता रहा. अमेरिका के एक चर्चित टैबलॉयड ने तो हमेशा अहमदीनेज़ाद को एक एविल मैडमैन से संबोधित किया, और चुनावों के ठीक पहले तो इस टैबलॉयड ने उन्हें बंदर और बौने तक की संज्ञा दे दी...