चौथी दुनिया पढ़िए, फैसला कीजिए

गुरुवार, २७ अगस्त २००९

मार्च में छह दिसंबर दुहराने की साज़िश

आर.के. यादव

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बार फिर अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि निर्माण मुद्दे को गरमाना चाहती है. अपनी खोती जा रही राजनैतिक पकड़ को मज़बूत करने के लिए वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ज़रिए 16 मार्च 2010 से इस दिशा में नई पहल शुरू करने की कोशिश में है. भाजपा की मंशा को देख संघ भी एक बार फिर अपने स्वयंसेवकों के साथ शंखनाद करके पूरे देश की राजनीति में अफरा-तफरी मचाने को तैयारी में है. मंदिर निर्माण के लिए 16 मार्च से 16 मई के बीच हरिद्वार में कुंभ मेले के दौरान निर्माण से जुड़े संगठन व संत कार्यशाला में रखी गई शिलाओं पर लग रही काई को साफ कराने तथा उन शिलाओं को विवादित परिसर के नज़दीक ले जाने की तैयारी करेंगे.हरिद्वार कुंभ मेले में संत यह भी तय करेंगे कि लखनऊ से अयोध्या तक वे पैदल चल कर जाएं और कारसेवकपुरम से राम जन्मभूमि के क़रीब तक शिलाओं को उठाकर ले जाएं. रामजन्म भूमि न्यास से जुड़े पूर्व सांसद डॉ. राम विलास वेदांती ने एक विशेष बातचीत मेंे बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली सरकार के समय एनडीए के घटक दल नहीं चाहते थे कि मंदिर निर्माण हो. यदि भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार होती तो अब तक मंदिर बन चुका होता. 1999 से लेकर 2008 तक भाजपा और आरएसएस द्वारा कोई भी आंदोलन स़िर्फ इसलिए नहीं किया गया कि उसे आशा थी कि जनता उसे हिंदुत्व और राम मंदिर निर्माण के राष्ट्रीय मुद्दे पर शासन-सत्ता पुन: सौंप देगी. लेकिन जनता उनके छलिया आश्वासनों को समझकर उनकी नीतियों को पूरी तहर चकनाचूर कर उन्हें सत्ता के नज़दीक भी नहीं फटकने दिया. ऐसे में सत्तालोलुप भाजपाइयों ने एक बार फिर हिंदुत्व की रक्षा और राम मंदिर निर्माण के लिए कुचक्र रचने में जुट गए हैं. स़िर्फ इस मक़सद से कि पार्टी की डूबती को बचाया जा सके. इसके लिए उसने आरएसएस और संतों को फिर हथियार बना डाला है. इसी उद्देश्य की ख़ातिर अभी हाल में ही आठ अगस्त को अयोध्या स्थित राम सुंदर धाम राजकोट में विहीप सुप्रीमो अशोक सिंघल, मणिराम छावनी महंत ज्ञानदास, धर्मदास, बड़ा भक्तमाला महंत कौशल किशोर दास, दिगंबर अखाड़ा के महंत सुरेश दास, डॉ. राम विलास वेदांती, महंत जगदेव दास, महंत कन्हैया दास आदि ने बैठक की. इसमें हिंदुत्व की बुझी आग को फिर जलाने का ़फैसला किया गया.श्री वेदांती ने बताया कि तीन मंज़िल तक बनने वाले जन्मभूमि मंदिर की दो मंज़िल तक के पत्थर तराशे जा चुके हैं. एक मंज़िल बाक़ी है जो निर्माण के समय ही पूरा कर लिया जाएगा. अभी आंदोलन की पूरी रूपरेखा कुंभ मेले में तय होनी है. संत यह भी तय करेंगे कि जिन शिलाओं का पूजन देश-विदेश में हुआ था, उन शिलाओं को विहिप से जुड़े संत राम जन्मभूमि के अत्यंत नज़दीक तक अपने सिर पर रख कर ले जाएं और वहां रखें. सवाल है कि क्या इस बार के कुंभ मेले में कारसेवकों के बिना ही संत कोई इतना बड़ा निर्णय लेने में कामयाब होंगे? ख़ास कर यह देखते हुए कि इस समय केंद्र में जहां कांग्रेस की अगुआई में मनमोहन सिंह की सरकार है, वहीं उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा की सरकार है. क्या मायावती सरकार इस बार भगवा ब्रिगेड को प्रदेश में घुसने की इजाज़त देगी, जबकि पूर्व में केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होते हुए भी एक लाख संतों ने कभी पैदल मार्च नहीं किया और न ही मंदिर निर्माण की सुधि आई. उस समय तो भाजपा के सांसद लोकसभा में बैठकर सत्तासुख भोगने में ही लगे रहे. और तो और, साधु-संन्यासी भी भाजपा के पूरे पांच साल के शासनकाल में मंदिर मुद्दे को लेकर न तो कोई प्रचार किया और न ही कोई आंदोलन चलाया. उस समय केवल एक ही आंदोलन ख़ूब फला-फुला. वह यह कि पूरे भारत में राम मंदिर निर्माण को लेकर कई समितियां बरसाती मेढ़क की तरह पैदा हो गईं. उन समितियों ने जनता के बीच हिंदुत्व की रक्षा और राम मंदिर निर्माण के नाम पर ख़ूब धन बटोर गईं.इस सवाल के जबाब में श्री वेदांती ने माना कि अयोध्या में राम जन्मभूमि न्यास,....




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सोमवार, १७ अगस्त २००९

हमें मौत दे दीजिए मुख्यमंत्री जी

शमीम अहमद

बुंदेलखंड में पड़े सूखे और भूख के कारण अब किसानों में आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया है. पिछले दो हफ़्तों में भुखमरी के शिकार चार किसानों ने आत्महत्या करके और आने वाले चंद दिनों में डेढ़ दर्जन किसानों ने आत्महत्या करने की घोषणा करके केंद्र और प्रदेश की सरकारों को कठघरे में खड़ा कर दिया है. आत्महत्याओं वाले इलाक़ों से इस समय तीन नेता प्रदेश सरकार में तो एक केंद्र सरकार में मंत्री हैं. विडंबना देखिए कि यहां के किसान फिर भी प्रशासन द्वारा अपेक्षा और उत्पीड़न से परेशान हैं. सूखे को लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने केंद्र के ख़िला़फ हाथ मिला लिया है. इन सबका असर यह हुआ है कि बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाक़ों में अफसरों ने किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता देने से मनाही कर दी है. यानी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच चल रही राजनीतिक लुका-छिपी का असर सीधे किसानों पर पड़ रहा है. हर तऱफ से छल होता देख किसान हताश हो गए हैं. इतने कि आत्महत्या जैसे क़दम उठाने लगे हैं. सूखा, क़र्ज़ और भूख से परेशान होकर 29 जुलाई को ललितपुर जनपद के ग्राम खिंतवास में 75 वर्षीय किसान मुन्नीलाल लोहार ने आत्महत्या कर ली. इसके बाद चार अगस्त को बैरवारा के 28 वर्षीय किसान गोविंद और नौ अगस्त को झांसी के टहरौली तहसील के 75 वर्षीय किसान क्षमाधर यादव ने भी आत्महत्या कर केंद्र और प्रदेश सरकारों के मुंह पर सूखे की हक़ीक़त का तमाचा जड़ दिया. सरकारों तक अपनी आवाज़ और आर्थिक मदद की गुहार कर रहे झांसी जनपद के बबीना ब्लॉक के गुवावली गांव के ही डेढ़ दर्जन किसानों ने प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए जल्द ही परिवार सहित आत्महत्या करने की शपथ ली है. इस सिलसिले में उन्होंने नौ अगस्त को एक हलफनामा तैयार कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को भेज दिया है. इसकी सूचना उन्होंने स्थानीय प्रशासन के अलावा कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी दे दी है. इन किसानों के पास एक हज़ार एकड़ से अधिक कृषि भूमि है, जिन पर इस व़क्त मूंग और मक्के की फसलें खड़ी हैं. बाक़ी फसलों में मूंगफली, सोयाबीन, तिली की फसल है जो पानी न मिलने के कारण बुरी तरह ख़त्म हो चुकी है. सपरिवार आत्महत्या करने की घोषणा करने वालों में ग्राम गुवावली, बबीना के पूर्व प्रधान चंदन सिंह पुत्र पंचम सिंह (49 वर्षीय), ग्राम ख़ास बबीना के 30 वर्षीय रामदास पुत्र बैजनाथ, ग्राम गुवावली के 62 वर्षीय कमल पुत्र स्व. हल्कू ढीमर, ग्राम गुवावली के ही वालिकदास पुत्र राज्जू, लल्लू कोरी पुत्र पच्चू, नंदराम पुत्र धनीराम, रामदास केवट पुत्र कमल, जगदीश पुत्र बंशी-बबीना, 45 वर्षीय रामप्रकाश कुशवाहा पुत्र रज्जू-ग्राम रसीना, हीरा लाल कुशवाहा पुत्र स्व. मोतीलाल मथनपुरा, 56 वर्षीय देशराज पुत्र तिजू, 32 वर्षीय रामकुमार यादव पुत्र पंचम सिंह शामिल हैं. आत्महत्या करने की घोषणा करने वाले इन किसानों की फसल पानी न मिलने के कारण लगभग पूरी तरह चौपट हो रही है. किसानों ने सरकार से मुफ़्त बिजली और खेतों को पानी देने की गुहार लगाई है. खेतों में खड़ी मूंगफली, सोयाबीन, तिल, मूंग, उड़द, मक्के की क़रीब 60 से 70 प्रतिशत फसल सूखती देख किसानों को ख़ून के आंसू रोना पड़ रहा है. मूंगफली की क़रीब 80 प्रतिशत खेती ख़त्म हो चुकी है. फसलों को बचाने के लिए सरकारों की खुली जंग और प्रशासनिक अमले के खड़े हाथ देख किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं. इससे केंद्र और दोनों संबद्ध राज्य सरकारों के ख़िला़फ आक्रोश बढ़ गया है. सूखे की स्थिति को देख किसानों को सूदखोर महाजनों और बैंकों ने किसी भी प्रकार का क़र्ज़ देने से इंकार कर दिया है. किसानों की इस भयावह स्थिति को देख केंद्र और प्रदेश सरकार अभी तक कोई ठोस योजना तैयार नहीं कर पाई है, किसानों के परिवार को भरपेट भोजन तो दूर पीने का पानी तक मुहैया नहीं हो पा रहा है. अपनी स्थिति देख पिछले एक माह में बुंदेलखंड के दस हज़ार से अधिक परिवार अपना घर छोड़कर अन्य क्षेत्रों की और पलायन कर चुके हैं. इन किसानों के पास मौजूद जानवरों में क़रीब एक हज़ार मौत के मुंह में जा चुके हैं, जबकि हज़ारों कसाइयों के शिकार हो गए हैं. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि प्रशासनिक अमला भी इनके गांवों में जाने से कतरा रहा है, जबकि नेता राज्य मुख्यालयों में दुबके बैठे हैं और किसान बराबर मौत को गले लगा रहा है. किसानों का आरोप है कि 2007 में पड़े भयंकर सूखे से भारी क़र्ज़ में फंस गए उनके परिवार अभी तक उस संकट से ही नहीं निकल पाए थे. ऐसे में इस साल के सूखे ने उन्हें भुखमरी के कगार पर ला दिया है. बबीना के इस क्षेत्र में दौ सौ कुंए हैं, जिनमें से तीन से पांच कुओं में पानी सड़ गया है, जो न तो खेती लायक है और न ही पीने के. इस क्षेत्र में 12 गांव हैं. इस क्षेत्र में क़रीब 10 हज़ार एकड़ भूमि उपजाऊ है. इसी क्षेत्र से उत्तर प्रदेश सरकार में अंबेडकर ग्राम विकास मंत्री रतनलाल अहिरवार और केंद्र में...


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रविवार, २ अगस्त २००९

बंगाल में आंधी

बिमल राय

9 अगस्त 1997 को जब कोलकाता के नेताजी स्टेडियम में कांग्रेस का 80वां पूर्ण अधिवेशन चल रहा था, उसी समय ममता ने मेयो रोड के चौराहे पर गांधीजी की प्रतिमा के सामने अपना तृणमूल का पौधा रोपा. उस समय वह स़िर्फ बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष पद मांग रही थीं, पर तृणमूल के टिकट पर सांसद बने सोमेन मित्र तब ममता के दुश्मन नंबर एक हुआ करते थे.
देह पर नीले बॉर्डर वाली उजली साड़ी और पैर में हवाई चप्पल. पानी और कीचड़ भरी सड़कों पर चलते समय छीटें पड़ते हैं तो पड़ें, मगर उन्हें वहां जल्दी पहुंचना है. इसलिए कि जनता पुकार रही है. बंगाल की तीन दशकों की वाम राजनीति के कुरुक्षेत्र में यह चेहरा हर जगह दिखा है. नाकामियों से निराश नहीं हुई. जनता के दुख-दर्द को अपना समझा, वह भी तहे दिल से. आंसू निकले तो तहे दिल से. आम नेताओं की तरह घड़ियाली नहीं. जी हां, ममता बनर्जी की इसी सादगी, संयम और परिश्रम ने उन्हें एक कामयाब जननेता की कुर्सी पर बैठाया है. अब राज्य की सत्ता के काफ़ी क़रीब दिख रहीं ममता अगले दो सालों में बंगाल की राजनीति की दिशा पलटने वाली हैं. 9 अगस्त 1997 को जब कोलकाता के नेताजी स्टेडियम में कांग्रेस का 80वां पूर्ण अधिवेशन चल रहा था, उसी समय ममता ने मेयो रोड के चौराहे पर गांधीजी की प्रतिमा के सामने अपना तृणमूल का पौधा रोपा. उस समय वह स़िर्फ बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष पद मांग रही थीं, पर तृणमूल के टिकट पर सांसद बने सोमेन मित्र तब ममता के दुश्मन नंबर एक हुआ करते थे. राज्य युवा कांग्रेस के मुखिया के रूप में कार्य करते हुए ही उन्होंने एक तरह से बग़ावत का बिगुल फूंक दिया था. सोमेन से झगड़े की बड़ी वजह माकपा से उनकी क़रीबी ही थी. ममता जहां वाम के ख़िला़फ कड़े तेवर अपनाने के पक्ष में रहती थीं, वहीं ममता के राजनीतिक तेवर बग़ावती या एक तरह से कहें तो अतिवादी रहे. 1984 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से खड़े माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर उन्होंने बंगाल की राजनीति में एक तरह से धमाका कर दिया था. उसके बाद ममता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.बग़ावती तेवर के कारण भी दिखे. आठ अप्रैल 1992 को बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में जब ममता पराजित हुईं, उनका क्षोभ पनपा. यह वैसा ही था कि सीनियर के मुक़ाबले किसी जूनियर को प्रोमोशन दे दिया जाए. उस समय सोमेन की संगठन पर पकड़ मज़बूत थी, मगर जनता में एक जुझारू नेता के रूप में स़िर्फ ममता ही दिखती थीं. बंगाल की गलियों में इस घायल शेरनी की दहाड़ गूंजने लगी. 1993 में ममता ने कांग्रेस के समानांतर ट्रेड यूनियन का गठन कर लिया. इससे उनके पार्टी से अलग होने के संकेत मिलने शुरू हो गए. ममता ने युवा शाखा को अपने तरीक़े से संचालित करना शुरू कर दिया. 1993 में ममता नदिया जिले की एक बलात्कार पीड़िता को लेकर राइटर्स बिल्डिंग चली गईं. वहां मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने मिलने से इंकार कर दिया तो वह बसु के घर के सामने धरने पर बैठ गईं. 23 जुलाई को यहां हुए हंगामे और पुलिस फायरिंग में 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ता मारे गए और इसे लेकर पूरे राज्य में उन्होंने आंदोलन किया. तृणमूल हर साल इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाती है. 1996 के विधानसभा चुनावों में आपराधिक छवि वाले नेताओं को विधानसभा का टिकट देने के मामले पर ममता ने गले में शाल का फंदा लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. 1997 में अग्निकन्या ने कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों का बायकाट किया. इस तरह कांग्रेसी के रूप में 35 साल और विक्षुब्ध के रूप में छह साल गुज़ारने के बाद नौ अगस्त 1997 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस नाम से पार्टी बनाई. एक सक्रिय कांग्रेसी के तौर पर क़रीब 12 साल के कार्यकाल में ममता ने अपने आंदोलनों से बंगाल कांग्रेस में नेतृत्व के ख़ालीपन को भरा, क्योंकि सिद्धार्थ शंकर राय के बाद बंगाल कांग्रेस एक तरह से नेतृत्वहीन हो गई थी. यह भी सच है कि कांग्रेस में रहने के दौरान ममता की ताक़त का एक बड़ा हिस्सा आपसी लड़ाई में ही जाया हुआ. दिल्ली में बैठे कांग्रेस आलाकमान ने कभी ममता का खुले रूप में साथ नहीं दिया. राजीव गांधी का बुलडोजरी अनुशासन वाला युग ख़त्म होने....

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रविवार, २६ जुलाई २००९

ऐसे फैलता है आतंकवाद

के एस राधाकृष्णन

आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, जनसंख्या विस्फोट, सामाजिक बहिष्कार , अतिवाद, नस्लीय अल्पसंख्यकों का दमन, जनजातीय वाद और धार्मिक व राजनीतिक दमन को अगर नहीं सुलझाया गया तो हथियारबंद हिंसा जन्म ले सकती है. चाहे हम इसे उग्रवाद, अतिवाद, आतंकवाद या अलगाववाद कुछ भी कहें. युद्ध की शुरुआत हमेशा आदमी के दिमाग़ में होती है और समान विचारों वाले लोग पूरी दुनिया में रहते हैं. इसी वजह से इसके परिणाम केवल विवाद वाले देश में ही नहीं महसूस नहीं किए जाते, बल्कि उनकी धमक कहीं और भी सुनाई देती है. आतंकवाद, अपराध और ग़ैर अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र विद्रोह के बीच की रेखाएं इतनी महीन और धुंधली पड़ गई हैं कि अब हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद में फर्क़ ही नहीं कर सकते. कई आतंकी अपने उद्देश्य के लिए लड़ते हुए मरना पसंद करते हैं, ताकि उनकी नज़र में जो सच है उसे पाया जा सके. वह महसूस करते हैं कि वह एक वंचित तबके का हिस्सा हैं और सुखद भविष्य की कोई उम्मीद उनके लिए बाक़ी नहीं है. वह अपनी ज़िंदगी दांव पर इसलिए लगाते हैं ताकि उनके हिसाब से दूसरों को भी शांति और भौतिक रूप से समृद्ध जीवन का अधिकार नहीं है.

आस्ट्रिया के राजकुमार की 1914 ई. में सरायेवो में हत्या का मामला पूरी तरह से आस्ट्रिया का आतंरिक मामला था, लेकिन इसकी वजह से पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ. दुनिया में आतंकवादी गतिविधियां भारत के साथ ही चीन, सोवियत संघ, वियतनाम, कंबोडिया और दक्षिण कोरिया-उत्तर कोरिया के अलावा इज़रायल-फिलीस्तीन और पाकिस्तान में भी देखी गई हैं. 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो या पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई के ताज होटल पर हुआ आतंकी हमला, हमारे बच्चों युवाओं और बूढ़ों ने उसे टी.वी. के पर्दे पर लाइव देखा. कई भारतीयों के लिए संसद पर 2001 में हुआ हमला दरअसल हमारे लोकतंत्र पर हमला था. खेलों को पसंद करने वाले लोग 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में वह हमला नहीं भूल सकते, जब तथाकथित फिलीस्तीनी जिहादियों ने 11 इज़रायली एथलीटों की हत्या कर दी थी. हालात यहां तक बिगड़ गए थे कि इज़रायल ने श्रृंखलाबद्ध तरीक़े से बम हमला करके सैंकड़ों गुरिल्लों को मार डाला था. मार्च 2009 में लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर रॉकेट लांचर और ग्रेनेड से हमला किया गया. इस वारदात में आठ लोग मारे गए, जबकि कई घायल हो गए थे. सौभाग्य की बात यही रही कि खिलाड़ियों को मामूली चोटें ही आईं.

हथियारों के मामले में तकनीकी विकास ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं, जहां आतंकी संगठनों को ताज़ातरीन हथियार क़ब्ज़ाने का मौका मिल जाता है और वे अधिक से अधिक बर्बादी और आतंक फैला सकते हैं. दुर्भाग्य से अब तक व्यापक नरसंहार वाले हथियारों के उत्पादन और संग्रहण तथा इस्तेमाल पर रोक नहीं है. हालांकि कुछेक सदस्य देशों ने उन हथियारों पर नियंत्रण के लिए और परमाणु हथियारों के नियमन के लिए संधियां भी की हैं. इस लक्ष्य को पाने के लिए कई तरह के सम्मेलन किए गए हैं. ख़बरें बताती हैं कि पूरी दुनिया में लगभग 36000 परमाणु हथियार हैं. इनमें रूस के पास सबसे अधिक 22,500 हथियार हैं जबकि अमेरिका के पास 12070, फ्रांस के पास 500, चीन के पास 450, ब्रिटेन के पास 380, भारत के पास 65 और पाकिस्तान के पास 25 परमाणु हथियार हैं. इन सबके अलावा दुनिया के 80 देशों ने व्यापक नरसंहार वाले रासायनिक और जैविक हथियार बना लिए हैं. अमेरिका ने 1200 से अधिक परमाणु परीक्षण किए हैं तो रूस ने लगभग 1000, ब्रिटेन ने लगभग 45, फ्रांस ने 210. चीन ने 50 और भारत ने लगभग 10 परमाणु परीक्षण किए हैं. पाकिस्तान ने भारत से होड़ लगाते हुए 10 के आस-पास परमाणु परीक्षण किए हैं, ईरान, इराक़, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया और लीबिया ने भी...


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सोमवार, २० जुलाई २००९

संसद, सर्वोच्च न्यायालय और सबसे बड़ी

सेक्स मंडी


लगता है केंद्र सरकार को धारा 377 हटाने की जल्दबाज़ी है. दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. वैसे तो, नेता और अधिकारी कोर्ट में लंबित मामले पर अपनी ज़ुबान खोलने से बचते हैं, लेकिन धारा 377 के मामले में क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली तो बोले ही, गृह सचिव गोपाल कृष्ण पिल्लई ने भी इंटरव्यू देना शुरू कर दिया है. गृह सचिव का कहना है कि सरकार दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के ख़िला़फ सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएगी. इसकी वजह है कि राजनीतिक गलियारों से यह ख़बर आ रही है कि सरकार दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से भी एक-दो

क़दम आगे की सोच रही है. यानी सरकार ने धारा 377 को पूरी तरह से ही ख़त्म करने का मन बना लिया है. हैरानी की बात है कि विरोधी पार्टियों ने भी इस मामले पर चुप्पी साध ली है. यह चुप्पी आगे आने वाले दिनों में काफी ख़तरनाक साबित होने वाली है. धारा 377 के हटते ही भारत में वेश्यावृत्ति (महिला और पुरुष) को मानो लाइसेंस मिल जाएगा. इस धारा को हटाने का ़फैसला महिला विरोधी भी है. इसलिए कि भारत की महिलाओं के हाथ से वह हथियार ही छिन जाएगा, जिसके ज़रिए वे अपने पति की मनमानी के ख़िला़फ क़ानून का सहारा ले सकती हैं. ऐसा लगता है कि भारतीय संसद और न्यायिक व्यवस्था जाने या अनजाने उन ताक़तों के हाथों भ्रमित कर दी गई है, जो ताक़त तीन खरब डालर की सेक्स इंडस्ट्री के पीछे है. दुनिया भर के कमज़ोर और उदार देशों में सेक्स की मंडी खोलने के बाद अब उनकी नज़र भारत पर टिकी है. इन ताक़तों को भारत में एक बड़ा सेक्स-बाज़ार नज़र आ रहा है. उन्हें लगता है कि भारत एक कमज़ोर देश है, जहां कुछ भी संभव है. यही वजह है कि ये ताक़तें भारत को दुनिया का चौथे नंबर का सेक्स-बाज़ार बनाने की ताक में हैं. जिस तरह देश का सुप्रीम कोर्ट किसी व्यक्ति या संस्था को यह नोटिस देता है कि आपके ख़िला़फ अमुक आरोप हैं और क्यों न हम आपको दोषी समझ लें? यदि आप दोषी नहीं हैं तो उसकी सफाई दें. ठीक उसी तरह देश की जनता को भी क्या यह मान लेने का हक़ नहीं कि इस देश को चलाने वाले लोग और इस देश की न्यायिक व्यवस्था जाने-अनजाने इस साज़िश में शामिल है ? हमारे पास जो तथ्य हैं, वे इस संदेह को पुष्ट करते हैं. भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के ़फैसले से देश में एक नई बहस छिड़ गई है. इस मामले से जुड़े तथ्यों को हम पाठकों के सामने सिलसिलेवार तरीक़े से रख रहे हैं, ताकि सभी संबंधित पक्ष अपनी-अपनी सफाई पेश कर सकें. यक़ीन मानिए, अगर हमारे आरोप ग़लत साबित होते हैं, तो हमें बहुत ख़ुशी होगी. अदालत में चले इस मामले के पूरे ब्योरे पर नज़र डालते हैं, ताकि जनता को कम से कम यह तो पता चले कि सच्चाई क्या है...

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सोमवार, १३ जुलाई २००९

संसद, सर्वोच्च न्यायालय और सबसे बड़ी

सेक्स मंडी


सन साठ के दशक में अमेरिका में कई नई बातें हुईं, जिनमें एक था वहां पर ड्रग्स का फैलाव. इसने तेज़ी से नौजवानों को अपने जाल में जकड़ना शुरू किया. ड्रग्स, यानी नशीली दवाओं के कई प्रकार सामने आए. लेकिन नौजवान इसमें उतनी तेज़ी से नहीं फंसे, जितनी तेज़ी से वहां पर बना ताक़तवार ड्रग्स माफिया चाहता था. सरकार भी चेती और उसने सख्ती कर दी, परिणामस्वरूप ड्रग्स का फैलाव थोड़ा धीमा हो गया.ड्रग्स का विरोध करने के लिए वहां कई सामाजिक संगठन खड़े हो गए. सेमीनार होने लगे, जिनमें बताया जाने लगा कि नशीली दवाएं ख़तरनाक हैं, इन्हें लेने वाला सपनों की दुनिया में चला जाता है, थोड़ी देर के लिए वह अपने वर्तमान से कट जाता है तथा संपूर्ण मुक्ति की अवस्था में वह पहुंच जाता है. ऐसी भाषा इस्तेमाल की जाने लगी कि सामाजिक व्यवस्था से विद्रोह करने के नाम पर नशीली दवाएं लेना सही रास्ता नहीं है. कई जगह यह भी बताया जाता था कि नशे की गोली या इंजेक्शन लेने पर लगता कैसा है. गोलियों और इंजेक्शनों को लेना किस मात्रा में ज़्यादा ख़तरनाक है, यह भी ड्रग्स विरोधी आंदोलनकारी बताते थे. सारा अमेरिका और यूरोप इन सेमीनारों, सभा, सम्मेलनों आदि के ज़रिए ड्रग्स के दुष्परिणमों से परिचित हो गया.लेकिन सन पच्चासी में आकर एक नया खुलासा हुआ. चूंकि ड्रग्स माफिया ने एनजीओ खड़े कर दिए, सभाओं, सेमीनारों के लिए फंड करना शुरू कर दिया, इसलिए उसने ड्रग्स का विरोध करने के नाम पर ड्रग्स का प्रचार शुरू करवा दिया और अमेरिका और यूरोप में सफलतापूर्वक अपना धंधा तीन सौ गुना ज़्यादा बढ़ा लिया. सरकार समझ ही नहीं पाई कि उसकी नाक के नीचे इतना बड़ा ग़ैरक़ानूनी धंधा बढ़ गया जिसने वहां की राजनीति तक में अपना प्रभाव बढ़ा लिया. पुलिस, प्रसासन, राजनीति सभी इन माफिया गु्रपों से डरने लगे. आज अमेरिका और यूरोप में सरकार के बाद की बड़ी ताक़त यही माफिया है, जिस पर हाथ डालना वहां की सरकारों के बस में भी नहीं रह गया है.
इससे मिलता-जुलता क़िस्सा हमारे देश में भी दोहराया जा रहा है, लेकिन यह ड्रग्स या नशीली दवाओं से जुड़ा नहीं है. हमारे देश में बड़ी मांग सालों पहले उठी कि हमारे यहां वेश्यावृत्ति को क़ानूनी दर्जा दे दिया जाए, वेश्याओं को लाइसेंस दिए जाएं ताकि वे टैक्स दें, अपने स्वास्थ्य की जांच कराएं और चोरी छुपे धंधा कर समाज का स्वास्थ्य न चौपट करें. यह अभियान सफल नहीं हो पाया, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी के संस्कारों के कारण अभियान केवल सभा सेमीनारों तक ही सीमित रह गया, इसे जन समर्थन नहीं मिल पाया.भारत में एक क़ानून है, तीन सौ सतहत्तर. यह क़ानून कहता है कि कोई भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए, चाहे वह पुरुष करे, महिला करे या कोई पशुओं के साथ करे, उसे क़ानूनन आजीवन कारावास तक का दंड दिया जा सकता है. चाहे यह काम खुले रूप में हो या किसी बंद कमरे में, दंड एक ही होगा. दस साल पहले देश में कुछ संस्थाओं ने आवाज़ उठाई कि यह क़ानून होमो सेक्सुअल लोगों की आज़ादी में बाधा डालता है. बंद कमरे में सैकड़ों सालों से बहुत कम लोग यह काम करते रहे हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री. बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो उनमें अपने विकसित होते अंगों को लेकर उत्सुकता होती है और वे आपस में आकर्षित हो जाते हैं. लेकिन सोलह साल आते-आते उनमें समझ आ जाती है. बहुत-सी जगहों पर, जहां वयस्कों को स्त्री के पास जाने का अवसर नहीं मिलता, वहां भी एक बहुत छोटी संख्या अप्राकृतिक यौन संबंध अस्थाई तौर बना लेती है. अभी भी सौ करोड़ के मुल्क में अंगुलियों पर भी गिने जाने लायक लोग नहीं हैं जो कहें कि उन्हें अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का अधिकार दिया जाए.
इसके बावजूद देश में ऐसे एनजीओ बनने लगे जो इन संबंधों की वकालत करने लगे. इनमें से कुछ ने कहा कि अप्राकृतिक यौन संबंधों की वजह से एड्‌स के फैलने का ख़तरा ज़्यादा है, इसलिए ऐसे लोगों का समूह हाई रिस्क ग्रुप है. और चूंकि तीन सौ सतहत्तर धारा की वजह से ये लोग सामने नहीं आते तो हम उनका इलाज और काउंसिलिंग नहीं कर पाते. इसलिए यह धारा समाप्त होनी चाहिए. जब हम अप्राकृतिक यौन संबंध की बात या होमो सेक्सुअल की बात कहते हैं तो इसे पुरुष और पुरुष के बीच का सेक्स संबंध मानना चाहिए, क्योंकि अभी तक स्त्री और स्त्री के बीच का सेक्स संबंध एड्‌स के कारणों के फैलाव में नहीं गिना जा रहा. मज़े की बात यह कि सरकार के पास न कोई अध्ययन रिपोर्ट है और न सरकारी आंकड़ा है कि पुरुष से पुरुष के सेक्स संबंध से कितनों में एड्‌स का फैलाव हुआ और उनमें अब तक कितने मरे. इतना ही नहीं, एड्‌स की जांच में औरतों की संख्या...


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मंगलवार, ३० जून २००९

लालगढ़ की लाल लपटें

बिमल राय

लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई. कुछ ऐसा ही हो रहा है, बंगाल के पुलिस प्रशासन के साथ. घनघोर अंधेरे में लिपटे लालगढ़ के वर्तमान को समझने के लिए कुछ देर हमें पीछे झांकना होगा. उसके बाद ही आगे की कड़ियों का तारतत्य समझ में आ सकेगा. दो नवंबर 2008 को सालबनी में ज़िंदल के प्रस्तावित स्टील प्लांट की जगह देखने जा रहे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्‌टाचार्य और तत्कालीन इस्पात मंत्री रामविलास पासवान के काफ़िले को बारूदी सुरंग से उड़ाने की साज़िश का पर्दाफाश करने का जिम्मा क्या मिला, बंगाल पुलिस ने इसे निरीह आदिवासियों पर ज़ुल्म ढाने का लाइसेंस ही समझ लिया. छोटो पेलिया, बोड़ो पेलिया, भासबेर और काटा पहाड़ी इलाकों में पुलिस ने बेरहमी की वो कहानी लिखी, जिसे भुला पाना ग़रीबी और ज़िल्लत की ज़िंदगी जी रहे आदिवासियों के लिए काफी मुश्किल है. इस तरह वे भी ख़ून के बदले ख़ून की जंग के साथ हो गए हैं.

विस्फोट के दो दिन बाद पांच नवंबर 2008 को छोटो पेलिया में पुलिस ने एक महिला के घर आए अतिथि को माओवादी व सालबनी विस्फोट कांड का मुख्य अभियुक्त बताकर पकड़ लिया. प्रतिरोध करने पर पुलिस बंदूक की बट से उसके माथे पर चोट करती है. उसकी एक आंख सदा के लिए चली गई है. एक और बानगी. उसी रात ठीक उसी गांव में पुलिस 8 वीं से 10 वीं कक्षा में पढ़ने वाले चार बच्चों को पकड़ लेती है. थाने में पता चलता है कि एक बच्चे का पिता सेना में है, तो उसको रिहा किया जाता है. काटा पहाड़ी स्कूल के हेडमास्टर को माओवादियों को संरक्षण देने के जुर्म में पकड़ा जाता है. 1998 से पहले लालगढ़ ऐसा नहीं था. गरीबी थी, पिछड़ापन था, पर बारूद की गंध नहीं थी. बूटों की खड़खड़ाहट नहीं थी, बम बरसाने की मुद्रा में गुर्रा रहे हेलिकॉप्टरों की निगरानी नहीं थी.

पूछा जा सकता है, सोचा जा सकता है कि आज लालगढ़ के हालात के ज़िम्मेदार कौन लोग हैं? पुलिस का कहर जारी रहा, बच्चों पर, बूढ़ों पर, महिलाओं पर. एक पुराना घिसा-पिटा तरीका-आम लोगों में आतंक कायम करो और सरकार की साख़ बहाल करो. इससेजनाक्रोश जितना उबल सकता था, उससे कहीं ज़्यादा उबला. आदिवासियों ने पुलिस संघर्ष विरोधी जनसाधारणेर कमेटी बनाई. इस तरह पुलिस और उसके साथ मिलकर काम करते आ रहे माकपा काडरों के लिए गाली की तरह इस्तेमाल किये जाने वाले शब्द हरमाद वाहिनी के खिलाफ़ जंग का ऐलान हो गया. रास्ते काटकर बंगाल सरकार की पुलिस और अधिकारियों का प्रवेश निषेध कर दिया गया. फिर भी अमन का एक रास्ता बचा था. संघर्ष समिति ने लोकसभा चुनावों से पहले कहा था कि अगर पुलिस जनता पर किए गए अत्याचारों के लिए माफी मांग लेती है तो वे अपना आंदोलन ख़त्म कर देंगे. 33 साल से राज कर रही वाम सरकार के मुखिया ने नंदीग्राम के अत्याचार के लिए तो र्मोंी मांग ली, पर लालगढ़ के पुलिसिया जुल्म के लिए माफी मांगने में उसे शायद शर्म आई. नतीजा यह हुआ कि पश्चिम मिदनापुर के कम से कम दर्जनों बूथों पर मतदान का बहिष्कार हुआ. आज लालगढ़ ज़ंग का मैदान बन गया है. एक ऐसी जंग, जिसके उस पार भी अपने ही परिजन....

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हम नहीं सुधरेंगे

भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का संदेश


भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हर मायने में विफल रही. इस बैठक के बाद भाजपा पहले से कहीं ज़्यादा भ्रमित नज़र आ रही है. नेतृत्व और विचारधारा को लेकर, संगठन को मज़बूत करने की बात पर, युवाओं को पार्टी में जगह देने के मसले पर, संघ के साथ संबंध के मुद्दे पर और हिंदुत्व के रूप और मायने पर भाजपा में दिशाहीनता की स्थिति है. हार की वजहों को ढूंढने निकली भाजपा का हाल यह रहा कि इस बैठक के ज़रिए पार्टी की अंदरूनी कलह सबके सामने आ गई. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नेता एक-दूसरे पर निशाना साधते नज़र आए. पार्टी के अंदर मौजूद सारे गुट सबके सामने आ गए. पार्टी के शीर्ष नेताओं ने अपने बयानों से कार्यकर्ताओं को निराश किया और बची-खुची कसर दूसरी पंक्ति के नेताओं ने आपस में लड़कर पूरी कर दी. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हाल किसी पिटे हुए बॉलीवुड फिल्म की तरह रहा. इसकी पृष्ठभूमि शानदार थी, ट्रेलर बनाने में भी ख़ासी मेहनत की गई, ज़ोरदार प्रचार भी किया गया, लेकिन भाजपा की इस फिल्म में कोई क्लाइमेक्स ही नहीं था-बहुत शोर सुनते थे, पहलू में दिल का, जो चीरा तो क़तरा-ए-ख़ूं भी न निकला. दो दिनों की सिरफुटव्वल का कोई नतीजा कुछ भी नहीं निकला. लालकृष्ण आडवाणी ने इस राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी को फिर से उसी दलदल में धकेल दिया जिसकी वजह से पार्टी गर्त में गई है. आडवाणी ने हार के लिए ज़िम्मेदार लोगों का बचाव किया. प्रेस में पार्टी के अनधिकृत रूप से रणनीतिकार बनकर पार्टी के ही ख़िला़फ लिखने वाले अपने चहेते सलाहकारों को बचाया. सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि आडवाणी संगठन को बचाने के लिए देश भर की यात्रा पर निकलेंगे, लेकिन उन्हें कौन बताए कि जब कार्यकर्ता ही पार्टी से रूठ जाएंगे तो आडवाणी की यात्रा भी पिछली यात्रा की तरह बेमानी ही हो जाएगी.


आडवाणी का हठ
लालकृष्ण आडवाणी के हठ का भी जबाव नहीं. हार के बाद उन्होंने स्वेच्छा से संन्यास की घोषणा कर दी थी. बाद में अपने सलाहकारों और उनके नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं के कहने पर वह लोकसभा में न स़िर्फ नेता प्रतिपक्ष बने, बल्कि अब पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए देश भर की यात्रा का ऐलान भी कर दिया. आडवाणी ने अपने गुट के नेताओं का पुरज़ोर बचाव किया. भाजपा के चुनाव मैनेजरों के बचाव में उन्होंने एक से एक दलीलें दीं. कुछ सच कुछ झूठ. आडवाणी ने भाजपा की सचिन तेंदुलकर से तुलना की. यह अजीबोगरीब है. उन्होंने कहा कि सचिन भी तो 99 पर आउट हो जाते हैं. यह तुलना ग़लत है, क्योंकि सचिन क्रिकेट के सबसे महान बल्लेबाज हैं. क्या आडवाणी खुद को या भाजपा को राजनीति का सचिन मानते हैं. अगर भाजपा की तुलना किसी क्रिकेटर से की जाए तो वह विश्वकप जीतने के बाद वेस्टइंडीज सीरीज में मोहिंदर अमरनाथ से की जानी चाहिए, जिन्होंने इस सीरीज में शून्य पर आउट होने का विश्व रिकार्ड बनाया था. आडवाणी जी को समझना चाहिए कि भाजपा यह चुनाव एक रन से नहीं हारी है, वह दूसरी बार जनता द्वारा नकार दी गई पार्टी बन चुकी है. आडवाणी का पूरा भाषण पार्टी के रणनीतिकारों को बचाने की कवायद रही. उन्होंने कुछ नेताओं की आपसी छींटाकशी पर भी...


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अस्तित्व बचाने की कवायद है, माया-भजन समझौता


संजीव पांडेय

अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दिन देख रहे भजनलाल ने अंतिम जुआ खेला है. कई तरफ से थपेड़े झेल रहे भजनलाल ने अब मायावती के सहयोग से हरियाणा में कांग्रेस को घेरने की योजना बनाई है. आने वाले विधानसभा चुनाव में भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी मिलकर चुनाव लड़ेगी. हरियाणा विधानसभा चुनाव में अपनी जीत निश्चित मान रही कांग्रेस के लिए निश्चित रुप से यह बुरी खबर है. वोट बैंक के लिहाज से बसपा और भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस का इकठा होना ख़तरनाक है. संभावना जताई जा रही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कड़ी टक्कर मिलेगी. राज्य में एक बार फिर गैर जाट मतदाताओं को इकट्ठा होने का अवसर मिला है. उधर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रहारों को झेल रही मायावती भी कांग्रेस को स्पष्ट संकेत दे रही है कि आने वाले समय में वे यूपी से बाहर गैर कांग्रेसी दलों से समझौता करेंगी. इससे निश्चित तौर पर कांग्रेस की परेशानी बढ़ेगी. मायावती की यह रणनीति यूपी में कांग्रेस को रक्षात्मक रुख लाने पर मजबूर कर सकती है.

18 जून को लखनऊ में मायावती, भजनलाल और उनके बेटे कुलदीप ने संयुक्त रुप से अपनी रणनीति का खुलासा किया. इस रणनीति के तहत हरियाणा विधानसभा चुनाव दोनों मिल कर लड़ेंगे. बड़े दल की भूमिका में भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस रहेगी, जबकि बसपा छोटे भाई की भूमिका में रहेगी. भजनलाल की पार्टी पचास सीटों पर चुनाव लड़ेगी. कुलदीप विश्नोई मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे. बसपा चालीस सीटों पर लड़ेगी. बसपा को सता में आने के बाद डिप्टी सीएम पद मिलेगा. वह दलित वर्ग से होगा. गुप्त तरीके से दिए गए इस समझौते से कांग्रेसी उलझन में फंस गए. आनन-फानन में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा शून्य प्लस शून्य बराबर शून्य. हालांकि यह बयान सच्चाई बयां नहीं करता. समझौते को जिस गुपचुप तरीके से अंजाम दिया गया उससे कांग्रेसी हैरान हैं. कांग्रेस को पता तक नहीं चला. राज्य सचिवालय की गैलरी में सक्रिय पत्रकारों को इसकी जानकारी तक नहीं मिली. सीधे लखनऊ से खबर आई, समझौता हो गया. पत्रकारों के फोन बजने लगे. क्योंकि सब कुछ अप्रत्याशित था. बसपा ने इस बार कांग्रेस को बेवकूफ बनाने के लिए अलग इशारा कर रखा था. बसपा नेता यह संकेत दे रहे थे कि विधानसभा चुनाव में समझौते के लिए उनकी बातचीत इनेलो के ओमप्रकाश चौटाला से चल रही है. इस समझौते के पीछे तर्क यह था कि इनेलो के जाट और बसपा के दलित समीकरण से राज्य विधानसभा में कांग्रेस को घेरा जाएगा. पर सारा खेल ही उल्टा हो गया.

उधर इन सारी परिस्थितियों में हजकां के अंदर हो रहे विद्रोह रुकने के संकेत है. हरियाणा जनहित कांग्रेस के दो नेता सुभाष बतरा और पूर्व मंत्री कृष्णमूर्ति हुड्डा ने हाल ही में विद्रोह कर दिया था और पार्टी अध्यक्ष कुलदीप विश्नोई को ही पार्टी से निकालने का दावा किया था. उन्हें लग रहा था कि भजनलाल अब गए दिन की बात हो गए. उनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है क्योंकि भजनलाल खुद काफी मश्किल से हिसार से लोकसभा जीत कर आए है. उधर लोकसभा चुनाव में 59 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को मिली बढ़त ने हरियाणा जनहित कांग्रेस के नेताओं को निराश कर दिया था.

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मायावती जी, ध्यान दीजिए

सप्तसागर झील को ख़त्म करने की साज़िश




आर के यादव और बी.डी शर्मा की रिपोर्ट

भारत की राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति में अयोध्या का महत्व किसी से छुपा नहीं है. यही वह स्थान है, जहां से राम के नाम पर शुरू हुई राजनीति की वजह से हिंदुस्तान की केंद्रीय और प्रादेशिक सत्ता में भूचाल आ गया. धर्म के नाम पर भाजपा की राजनीति राममंदिर के निर्माण को लेकर केंद्रीय सत्ता में चमकी. इसी अयोध्या में भगवान राम के अस्तित्व से ज़ुडा और कई एकड़ क्षेत्र में फैली सप्तसागर नाम की झील आज शासन, प्रशासन और भू-माफियाओं के कारण अपनी पहचान खो चुकी है. इसको बचाने के लिए अयोध्या में कोई महंत या भाजपा का कोई संगठन भी नहीं आया. यदि सप्तसागर का नाम आज के अयोध्या में लिया जाए तो वहां सप्तसागर कॉलोनी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा. सप्तसागर के नाम से जो खाली ज़मीन पड़ी है, उसमें भी अधिकतर को बड़े रसूख वालों के नाम पट्टा कर दिया गया है. लोग मकानों के निर्माण में लगे हैं. इस काम में विकास प्राधिकरण भी पीछे नहीं है. ज़मीन का सौदा बाद में होता है और उसका ऩक्शा पहले बन जाता है. धर्म के ठेकेदारों को इस सप्तसागर के अस्तित्व को ख़त्म करने के लिए मोटी रकम मिल रही है, और इसीलिए आज तक किसी ने इस धरोहर को बचाने की पहल नहीं की.


सप्तसागर का ऐतिहासक महत्व
इतिहासों में वर्णित है कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के राज्याभिषेक के अवसर पर इसमें सातों समुद्रों और समस्त तीर्थो का जल डाला गया, तब से इसका नाम सप्तसागर पडा. ऐसा भी पुराणों में वर्णित है कि सीता नित्य अपनी सहचरियों के साथ कनक भवन से निकल कर सप्तसागर में स्नान कर सप्तसागर के तट पर विराजमान काली जी कीपूजा किया करती थीं. राज परिवार के लोगों का जब विवाह होता था तो उनकी मौरी सप्तसागर में ही विसर्जित की जाती थी. अयोध्यामहात्म्य पुस्तक के अनुसार श्री अयोध्यानगरी के मध्य भाग में रमणीय सप्तसागर नाम का कुंड है जो इच्छित फल देने वाला है. हर पूर्णिमा को समुद्र स्नान करने से जो पूर्ण फल प्राप्त होता है, वही फल इस कुंड में किसी भी दिन स्नान करने से मिलता है. यहां की प्रसिद्घ वार्षिक यात्रा...


कौन है सप्तसागर की जमीन का असली मालिक
आज़ादी के बाद गांवों में ज़मींदारी व्यवस्था तो ख़त्म हो गई थी लेकिन शहरी क्षेत्रों में ज़मींदारी व्यवस्था नहीं ख़त्म हो सकी. अयोध्या में सप्तसागर पर अयोध्या स्थित बड़ा स्थान तथा राजगोपालाचारी मंदिर का आधिपत्य रहा. सप्तसागर की सुरक्षा इन्हीं दो मंदिरों के कर्ताधर्ताओं के विवेक पर निर्भर रही. जब तक धर्मनगरी में धार्मिक आंदोलन चलते रहे, तब तक सप्तसागर झील के रूप में विद्यमान रहा और अयोध्या का पानी उसमें इकट्ठा होता रहा. यह लगता रहा कि सप्तसागर की विरासत ज़िंदा है.आज हालात बदल गए हैं. इस ज़मीन पर दलालों एवं भूमाफियों की नज़र लगभग तीन वर्ष पहले लगी थी. उन्होंने बड़ा स्थान तथा राजगोपालाचारी मंदिरों के महंतों को प्रलोभन देना शुरू किया. साथ ही दलालों ने मोटी कमाई के लालच में ग्राहकों को जुटाना शुरू किया, ये दलाल स्वयं तो पट्टा करते नहीं, केवल ग्राहकों को ढूंढते हैं और पट्टे का काम बड़ा स्थान तथा उससे जुड़े पट्टेदार स्वयं करते है, इन महंतों का कार्य भी इस तरह से चलता है कि किसी को यह शक न हो कि पट्टा कब और कैसे हो गया. इसकी भनक किसी को न लगे, इसके लिए इन दोनों मंदिरों में ज़मीनों के रख-रखाव व खरीद-फरोख़्तके लिए अलग विभाग हैं. ज़मीन की बिक्री कितने में होती है, सौदा कौन करता है, इससे इन महंतों को मतलब...


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